सरगुजा समय अंबिकापुर: कहते है की बच्चों के भविष्य को सवारने के लिए एक अच्छे विद्यालय एवं अच्छे शिक्षक का होना अत्यंत आवश्यक है, शिक्षक को भगवान ने भी पहला स्थान दिया है जिस कारण शिक्षक का दर्जा भगवान से पहले माना जाता है। परंतु अंबिकापुर छत्तीसगढ़ में बिरला ओपन माइंड स्कुल एक ऐसा स्कुल साबित हो गया जहाँ के बड़ी ईमारतो में संचालित स्कुल एवं साज सज्जा चकाचौध के आगे शिक्षा का स्तर दम तोड़ता दिख रहा है जिसके वजह से यहाँ अपने बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावक एवं बच्चों दोनों को अपने उज्जवल भविष्य की कामना पर विचार करने पर मजबूर कर दिया है।
बता दें की स्कूलों को बच्चों के भविष्य का निर्माण करने वाला मंदिर कहा जाता है, जहाँ संस्कारों, शिक्षा और नैतिक मूल्यों की सीख दी जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के प्रतिष्ठित बिरला ओपन माइंड इंटरनेशनल स्कूल (Birla Open Minds International School) में जो हुआ, उसने शिक्षा व्यवस्था की साख पर बट्टा लगा दिया है। जिस स्कूल में बच्चों को शिष्टाचार सिखाया जाना चाहिए, वहाँ एक शिक्षिका ने आठवीं के छात्र से हिंदी और अंग्रेजी में 200 बार अश्लील गालियां लिखवा डालीं। यह घटना केवल एक सजा नहीं, बल्कि शिक्षा के गिरते स्तर और शिक्षकों की मानसिकता पर एक करारा तमाचा है।
जहाँ गालियों का पाठ पढ़ाया जाए, वहाँ बच्चों के भविष्य की कल्पना कैसी?
सवाल यह उठता है कि जिस संस्थान में ज्ञान की जगह गालियों के अभ्यास को सजा के रूप में परोसा जा रहा हो, वहाँ पढ़ने वाले नौनिहालों का भविष्य क्या होगा? शासन को चाहिए की इस तरह के बेलगाम प्राइवेट स्कुल पर कड़ी कार्यवाही करते हुए मान्यता निरस्त करके सदैव के लिए ताला जड़ दिया जाए जिससे अन्य स्कूलों के संचालक एवं शिक्षक शिक्षकाओं को एक कड़ा सन्देश मिल सके की कैसे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करना भारी पड़ सकता है।
मानसिक प्रताड़ना और कुंठा ऐसे शिक्षकों को ब्लैक लिस्टेड करने की आवश्यकता: बच्चों का मन कोमल होता है। जब एक शिक्षक ही छात्र को अश्लील शब्द बार-बार लिखने और कॉपी पर माता-पिता के हस्ताक्षर कराने पर मजबूर करता है, तो बच्चों पर इसका बेहद नकारात्मक और गहरा मानसिक प्रभाव पड़ता है। इससे बच्चों में सुधार होने के बजाय उनके भीतर विद्रोह और हीनभावना पैदा होती है। इस तरह के कृत्य से मासूम बच्चों को अपने अभिभावक के नजरों में दोषी एवं जलील करने की मनसा शिक्षिका की होंगी यह भी माना जा सकता है, ऐसे शिक्षकों पर विभाग द्वारा कड़ी कार्यवाही करते हुए सदैव के लिए ब्लैक लिस्टेड कर देना चाहिए जिसके बाद यह किसी भी अन्य स्कुल में अपनी कुंठित सोच को बच्चों के सामने ना परोस सके।
शिक्षकों की भूमिका पर गंभीर सवाल: शिक्षक मार्गदर्शक होते हैं, लेकिन जब शिक्षक ही बच्चों को सुधारने के नाम पर अशिष्टता का पाठ पढ़ाने लगें, तो अभिभावक अपने बच्चों को स्कूलों में भेजने से डरेंगे। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज के शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की चयन प्रक्रिया और उनकी मानसिक स्थिति की अनदेखी की जा रही है?
स्कूल प्रबंधन की बेलगाम मनमानी: स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि इस स्कूल की मनमानी पहले भी सुर्खियों में रही है और पूर्व में भी नियमों की अवहेलना पर भारी-भरकम जुर्माना लगाया जा चुका है। इसके बावजूद प्रबंधन और शिक्षकों के रवैये में कोई सुधार नहीं आया है, जो यह दर्शाता है कि उन्हें प्रशासनिक कार्रवाई का कोई खौफ नहीं है।
इस शर्मनाक घटना के सामने आने के बाद अभिभावकों और छात्र संगठनों में भारी उबाल है। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) दिनेश झा ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ जांच और नोटिस से इन लापरवाह संस्थानों की नकेल कस पाएगी? या फिर इस संस्थान पर कड़ी कार्यवाही करते हुए मान्यता निरस्त कर सदैव के किए स्कुल पर ताला जड़ा जायेगा, क्योंकि जिस विद्या के मंदिर में बच्चों का भविष्य उज्जवल करने की जिम्मेदारी है वही संस्थान बच्चों के भविष्य को अंधकार में डालने का कार्य कर रहा है।
अभिभावकों की मांग है कि इस तरह की असंवेदनशील शिक्षिका और स्कूल प्रबंधन पर इतनी कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, जो अन्य निजी स्कूलों के लिए एक कड़ा सबक बने ताकि भविष्य में कोई भी संस्थान बच्चों के भविष्य और उनके संस्कारों के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके।

