सरगुजा समय समाचार पत्र :- सरगुजा की धरती पर प्रशासनिक निष्क्रियता और भ्रष्ट तंत्र का इससे शर्मनाक उदाहरण शायद ही कुछ और हो सकता है। अंबिकापुर के खरसिया रोड स्थित ‘विजय ट्रेडिंग कंपनी’ पर करोड़ों रुपये के उर्वरक (खाद) मामले का काला सच सामने आए लगभग एक साल पूरा होने को है, लेकिन आज दिनांक तक कंपनी पर ‘राजसात’ (जब्ती) की कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।
कलेक्टर के सख्त आदेश और अल्टीमेटम के बावजूद क़ृषि विभाग के DDA के कान में जू तक रेंगती नहीं दिखी और लगभग एक वर्ष बितने को हैं लेकिन राजसात की कार्यवाही नहीं हो पाई।
DDA पीताम्बर सिंह दीवान अपने मलाईदार कुर्सी में इतने मदमस्त हैं की इन्हे किसी भी कार्यवाही से लेना देना नहीं हैं बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा की विभागीय कार्य करने के बजाय भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें की DDA दीवान वही साहब हैं जो सरगुजा कलेक्टर से पहले बिना अधिकार के विजय ट्रेडिंग कम्पनी में राजसात की कार्यवाही के लिए टीम बना डाले थे, परन्तु राजसात की कार्यवाही आज दिनांक तक नहीं हो पाई।
DDA के कार्यशैली से यह अंदाजा लगाया जा सकता हैं की शासन के तमाम नियमों को दरकिनार करते हुए सिर्फ भ्रस्ट अफसरों एवं नियम विरुद्ध उर्वक बिक्री करने वालों को पनाह देते हुए उनके आगे घुटने टेकते नजर आ रहे हैं, जिससे साफ पता चलता है कि सरगुजा में कानून नहीं, बल्कि सिस्टम की मिलीभगत और रसूख का सिक्का चल रहा है।
कलेक्टर के द्वारा बनाया गया राजसात टीम भी DDA के आगे बेअसर: सिर्फ तारीखें बदलीं, हालात नहीं
जिले के मुखिया यानी सरगुजा कलेक्टर अजित वसंत द्वारा विजय ट्रेडिंग कंपनी के अवैध मामलों पर शिकंजा कसने के लिए 20 फरवरी 2026 को विशेष राजसात टीम का गठन किया गया था। आदेश में स्पष्ट निर्देश था कि महज 7 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपकर आगे की कानूनी कार्रवाई पूरी की जाए।
लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी कलेक्टर का यह आदेश सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ा रहा है। धरातल पर एक इंच भी कार्रवाई नहीं हुई। क्या अंबिकापुर से लेकर रायपुर तक बैठे बैठे रसूखदार अधिकारियों के पसीने इस फर्म के आगे छूट रहे हैं? आखिर कौन सी ऐसी अदृश्य ताकतें हैं जो करोड़ों के घोटालेबाज को बचाकर बैठी हैं?
भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे जिम्मेदार और घूसखोरी के खुलासे
इस पूरे प्रकरण की परतें जब उघड़ीं, तो प्रशासनिक अमले के भीतर चल रहा भ्रष्टाचार का खेल बेनकाब हो गया:
रिश्वत की डील: सूत्र पहले ही उजागर कर चुके थे कि विजय ट्रेडिंग के करोड़ों के अवैध उर्वरक को बचाने के लिए 10 से 15 लाख रुपये की बड़ी डील का खेल चल रहा था।
एसीबी की गिरफ्त में निरीक्षक: इस मामले से जुड़े तत्कालीन उर्वरक निरीक्षक सोहन लाल भगत को भ्रष्टाचार के एक अन्य मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) द्वारा 1 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इससे साफ है कि इस विभाग में किस स्तर पर सौदेबाजी का बाजार गर्म था।
अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर खेल: कृषि विभाग के उप-संचालक पीताम्बर सिंह दीवान पर भी आरोप है कि उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर राजसात के नाम पर टीम बनाई, जिसका मकसद सिर्फ कागजी खानापूर्ति और कथित अवैध दबाव बनाना था। इतनी गंभीर अनियमितताओं के बाद भी इन पर मेहरबानी प्रशासनिक संरक्षण की पोल खोलती है।
अन्नदाता लाइनों में बेहाल, घोटालेबाज बेखौफ
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि एक तरफ सरगुजा का किसान खाद के एक-एक कट्टे के लिए सुबह से रात तक दुकानों के बाहर धूप और बारिश में लंबी लाइनों में धक्के खाने को मजबूर है। खाद की भयंकर किल्लत से किसानों का हाल बेहाल है।
वहीं दूसरी तरफ, विजय ट्रेडिंग कंपनी के गोदामों और तालों के पीछे करोड़ों रुपये का उर्वरक स्टॉक डंप पड़ा है, जिस पर प्रशासन आज तक ‘राजसात’ का ताला नहीं जड़ पाया है। दो-दो जगह जांचटीमें बनीं, बड़े-बड़े आदेश निकले, लेकिन नतीजा सिफर रहा!
अब जनता और किसानों का बड़ा सवाल
क्या सरगुजा प्रशासन के पास इस रसूखदार कंपनी पर कार्रवाई करने का माद्दा नहीं बचा है? या फिर यह पूरा प्रशासनिक महकमा सिर्फ लीपापोती करने के लिए बैठा है?

