सरगुजा समय वाड्रफनगर (बलरामपुर-रामानुजगंज)
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में आदिवासी भूमि के कथित फर्जीवाड़े को लेकर प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है। अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) द्वारा निरस्त किए गए एक संदिग्ध भूमि सौदे की अपील जब अपर कलेक्टर न्यायालय पहुंची, तो वहां का घटनाक्रम और अधिक विवादित हो गया। प्रार्थी पक्ष ने सनसनीखेज आरोप लगाया है कि स्थानांतरण के ठीक पहले पीठासीन अधिकारी ने निर्धारित तारीख (7 अक्टूबर 2026) का इंतजार किए बिना, आनन-फानन में 29 सितंबर 2026 को ही अपील पर फैसला सुनाकर प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया।
फर्जीवाड़े की नींव: 2.5 किमी दूर स्थित जमीन का बना दिया नक्शा सुधार:- पूरे मामले का खुलासा ग्राम रजखेता (वाड्रफनगर) स्थित जमीन से शुरू हुआ। रिकॉर्ड के मुताबिक मूल जमीन खसरा नंबर 1035, रकबा 0.28 हेक्टेयर, जो आदिवासी किसान रामसुन्दर (पिता बोधन गोड़) की पैतृक भूमि थी।
वर्ष 2017 में तहसीलदार न्यायालय से त्रुटि सुधार (प्रकरण 97/अ-6-अ/2016-17) के नाम पर इस जमीन को सामान्य वर्ग के खातेदार रामस्वरूप के नाम खसरा नंबर 1273 से जोड़कर बदल दिया गया। परन्तु जब जांच हुई तो पता चला कि आदिवासी की जमीन खसरा नं. 1035 और गैर-आदिवासी की खसरा नं. 1273 के बीच लगभग 2.5 किलोमीटर का फासला है। दोनों जमीनों की सीमाएं आसपास भी नहीं थीं, फिर भी नक्शा दुरुस्ती का प्रस्ताव बनाकर जमीन का स्वामित्व बदल दिया गया। और रिकॉर्ड दुरुस्त होते ही जमीन को आगे सत्यानन्द पाण्डेय और आकेत जायसवाल के नाम बेच दिया गया।
SDO कोर्ट ने लगाई थी कड़ी फटकार, दिए थे आपराधिक जांच के निर्देश:- इस मनमाने आदेश के खिलाफ जब मामला अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) वाड्रफनगर के न्यायालय पहुंचा, तो कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। 29 सितंबर 2025 को जारी आदेश में एसडीओ ने स्पष्ट लिखा 2.5 किमी दूर स्थित जमीनों की सीमाओं का कोई तालमेल नहीं है; यह प्रथम दृष्टया कूटरचना और भ्रामक प्रतिवेदन का मामला है। आदिवासी खातेदार को न कोई सूचना दी गई, न सुनवाई का मौका मिला, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा हनन है।
भू-राजस्व संहिता की धारा 170-ख (आदिवासी भूमि संरक्षण) की अनदेखी कर भू-माफियाओं को लाभ पहुंचाने का प्रयास दिखता है।
एसडीओ ने 2017 का तहसीलदार आदेश निरस्त कर जमीन को वापस मूल आदिवासी खातेदार के नाम बहाल कर दिया और संलिप्त राजस्व निरीक्षक सहित अन्य पर आपराधिक कार्रवाई की अनुशंसा की।
अपर कलेक्टर कोर्ट में नया मोड़: ‘तारीख से पहले ही सुना दिया फैसला’ :- एसडीओ के आदेश को पलटवाने के लिए अपर कलेक्टर न्यायालय में अपील (क्रमांक 202509960100127) दायर की गई। 16 सितंबर 2026 को दोनों पक्षों की ओर से लिखित बहस पेश होने के बाद कोर्ट ने अंतिम आदेश के लिए 7 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की थी। लेकिन प्रार्थी पक्ष का दावा है कि तत्कालीन अपर कलेक्टर आर.एन. पाण्डेय ने तबादला होते ही आनन-फानन में निर्धारित तिथि से हफ्ता भर पहले—29 सितंबर 2026 को ही आदेश पारित कर प्रकरण बंद कर दिया।
प्रार्थी ने सीधा आरोप लगाया है कि अंतिम आदेश सुनाने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने और आपत्तियां दर्ज कराने का मौका नहीं दिया गया। संबंधित पक्षकारों से कथित साठगांठ और लेन-देन के चलते स्थानांतरण की आड़ में आनन-फानन में यह निर्णय पारित किया गया।
(नोट: कथित आर्थिक लेन-देन और मिलीभगत के इन आरोपों की पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या सक्षम अदालत द्वारा होना अभी बाकी है।)
कमिश्नर से निष्पक्ष जांच और आदेश निरस्त करने की मांग
इस पूरे प्रकरण ने अब बड़ा तूल पकड़ लिया है। प्रार्थी पक्ष ने संभागीय आयुक्त (सरगुजा संभाग) और राज्य शासन से मामले में तत्काल दखल देने की मांग की है। मांग की गई है कि पेशी डायरी (Order Sheet) की फॉरेंसिक और प्रशासनिक जांच कराई जाए कि जब पेशी 7 अक्टूबर की थी तो 29 सितंबर को आदेश कैसे और किन परिस्थितियों में जारी हुआ।
मामला केवल जमीन के एक टुकड़े का नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा और राजस्व व्यवस्था की साख पर लगे गंभीर दाग का बन चुका है।
