सरगुजा समय अंबिकापुर: समाज की संकीर्ण और रूढ़िवादी सोच एक बार फिर इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना के रूप में सामने आई है। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर के वार्ड क्रमांक 04, शंकर नगर में एक लगभग 75 वर्षीय वृद्ध महिला श्रीमती सावित्री देवी का निधन हो गया। मृतिका के आगे-पीछे कोई नहीं था और आरोप है कि उनके द्वारा दूसरे समाज में प्रेम विवाह किए जाने के कारण स्थानीय जाति समाज का कोई भी व्यक्ति उनके अंतिम संस्कार के लिए आगे नहीं आया।
हालाँकि, इस अमानवीय और दुखद परिस्थिति में अंबिकापुर नगर निगम की महापौर मंजूषा भगत देवदूत बनकर सामने आईं और मृतका को अंतिम विदाई देते हुए मानवीय मूल्यों की एक अनूठी मिसाल पेश की।
यहाँ जाने क्या है पूरा मामला? प्राप्त जानकारी के अनुसार, शंकर नगर वार्ड क्रमांक 04 निवासी श्रीमती सावित्री देवी (लगभग 75 वर्ष) का निधन हो गया था। उनके परिवार में कोई नहीं था। जब उनके निधन की सूचना स्थानीय समाज और लोगों तक पहुँची, तो कथित सामाजिक पाबंदियों और इस बात का हवाला देकर कि उन्होंने जीवनकाल में दूसरे समाज में विवाह किया था, किसी ने भी उनका अंतिम संस्कार करने या कंधा देने की सुधि नहीं ली। एक इंसान के जीवन का यह अंतिम और अनिवार्य पड़ाव भी उपेक्षा का शिकार हो गया।
महापौर मंजूषा भगत ने लिया संज्ञान, निगम अमले के साथ खुद उठाई जिम्मेदारी:- जब इस घटना की जानकारी अंबिकापुर नगर निगम की महापौर मंजूषा भगत तक पहुँची, तो उन्होंने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए प्रशासनिक संवेदनशीलता का परिचय दिया।
महापौर ने बिना एक पल गंवाए नगर निगम के अमले (कर्मचारियों) को मौके पर भेजा और अपनी निगरानी में मृतिका श्रीमती सावित्री देवी का ससम्मान अंतिम संस्कार संपन्न कराया। प्रशासन की इस त्वरित और मानवीय पहल ने यह साबित कर दिया कि भले ही तथाकथित समाज अपनी संकीर्णता के चलते मुंह मोड़ ले, लेकिन एक जनप्रतिनिधि और प्रशासन का कर्तव्य हर नागरिक की गरिमा की रक्षा करना है।
“मौत के बाद भी समाज का किनारा करना दुर्भाग्यपूर्ण”
इस घटना ने एक बार फिर समाज के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जाति और रूढ़िवादिता इंसान के जीवन के साथ-साथ उसकी अंतिम सांस और मृत्यु के बाद भी पीछा नहीं छोड़ेगी? इस अमानवीय घटना की हर तरफ निंदा हो रही है, वहीं महापौर मंजूषा भगत के इस साहसी और संवेदनशील कदम की पूरे शहर में सराहना की जा रही है।
अंतिम विदाई किसी भी इंसान का मौलिक अधिकार है, और इस घटना ने यह दिखा दिया कि जब समाज अपने फर्ज से पीछे हटता है, तब मानवीय संवेदनाएं ही असली धर्म का पालन करती हैं।

