सरगुजा समय अंबिकापुर :-सरगुजा संभाग में परिवहन तंत्र नियमों से नहीं, बल्कि दबंग बस संचालकों के खौफ और विभागीय सिंडिकेट के गठजोड़ से चल रहा है। अंबिकापुर से बनारस मार्ग पर चल रही बसों की पड़ताल में एक ऐसा चौंकाने वाला खेल सामने आया है, जिसने कानून व्यवस्था की बखिया उधेड़ कर रख दी है। कागजों में बसों का रूट परमिट सिर्फ छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती गांव ‘धनवार’ तक का स्वीकृत है, लेकिन बेखौफ होकर ये बसें रोजाना उत्तर प्रदेश की सीमा लांघकर सीधे बनारस (वाराणसी) तक दौड़ाई जा रही हैं।
इस गोरखधंधे पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी जिन आला अफसरों के कंधों पर है, वे बस माफियाओं की दबंगई के सामने पूरी तरह लाचार, सहमे और कथित ‘माहवारी दलाली’ के आगे नतमस्तक नजर आ रहे हैं।

अंबिकापुर से बनारस (वाराणसी) मार्ग पर लंबे समय से नियमों को ताक पर रखकर बसों का संचालन बेखौफ जारी है। परिवहन विभाग के नियमों के अनुसार ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट (AITP) या विशेष टूरिस्ट परमिट के तहत संचालित वाहनों को केवल पूर्व-निर्धारित यात्रियों (कॉन्ट्रैक्ट कैरिज) के समूह को लाने और वापस ले जाने की अनुमति होती है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
टूरिस्ट परमिट की आड़ में ‘स्टेज कैरिज’ का खुला उल्लंघन यात्री सूची (Passenger List) का फर्जीवाड़ा: टूरिस्ट परमिट का सीधा नियम है कि यात्रा शुरू होने से पहले जिन यात्रियों की सूची दर्ज होती है, वही यात्री पूरे सफर और वापसी के भागीदार होते हैं। बीच रास्ते से सवारी बैठाना या गंतव्य पर नई सवारियां भरकर लौटना मोटर व्हीकल एक्ट के तहत पूर्णतः गैर-कानूनी है।
बनारस से अंबिकापुर एवं अंबिकापुर से बनारस आने जाने पर सवारी की अदला-बदली पर सवाल: यदि बसें वाकई टूरिस्ट परमिट पर चल रही हैं, तो अंबिकापुर से जो यात्री बनारस गए, वापसी में उनके बदले नए टिकट काटकर अलग सवारियां कैसे लाई जा रही हैं? यह साबित करता है कि टूरिस्ट परमिट केवल कागजी ढाल है, जबकि असल में नियमित ‘स्टेज कैरिज’ (प्रति यात्री टिकट) का अवैध संचालन हो रहा है।

अंतरराज्यीय परमिट (Interstate Permit) का अभाव और राजस्व को चपत लगाने टैक्स की चोरी खुलेआम : नियमित अंतरराज्यीय रूट परमिट के लिए दोनों राज्यों (छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश) के बीच पारस्परिक समझौता (Reciprocal Agreement) और भारी भरकम टैक्स का भुगतान जरूरी होता है। परन्तु यहाँ कुछ अधिकारीयों के दलाली के कारण दोनों ही प्रदेश में राजस्व की चोरी की जा रही है एवं बिचौलिए दलाल अफसर आर्थिक लाभ से मौज काट रहें है।
बता दें की सम्बंधित दलाल अफसरों के दलाली पूर्वक कार्य कर कारण दोनों प्रदेश में बस संचालकों की मौज देखने कों मिल रही है नियमित परमिट की औपचारिकताओं और टैक्स से बचने के लिए बस संचालक टूरिस्ट परमिट का दुरुपयोग कर रहे हैं। इससे शासन को हर माह लाखों रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान हो रहा है, जबकि बस ऑपरेटरों की जेबें भर रही हैं।
आरटीओ अधिकारी एवं उड़नदस्ते की भूमिका संदिग्ध इनकी निगरानी या मौन स्वीकृति?:- जांच के नाम पर औपचारिकता एवं दलाली अंतरराज्यीय सीमाओं और मुख्य चौराहों पर परिवहन विभाग के चेकपोस्ट और उड़नदस्ते मौजूद होने के बावजूद ये बसें रोजाना निर्धारित समय पर कैसे संचालित हो रही हैं? जब भी इन अवैध रूप से बसों के संचालन पर सवाल उठते हैं, कागजात ‘दुरुस्त’ होने या ‘टूरिस्ट परमिट’ का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। पैसेंजर लिस्ट का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) न करना साफ दर्शाता है कि कहीं न कहीं जिम्मेदारों की मिलीभगत और संरक्षण से यह अवैध नेटवर्क फल-फूल रहा है।
यात्रियों की सुरक्षा और जवाबदेही शून्य हादसे की स्थिति में क्लेम का संकट: टूरिस्ट परमिट का उल्लंघन कर अवैध रूप से ढोई जा रही सवारियों का यदि रास्ते में कोई हादसा हो जाए, तो बीमा कंपनियां (Insurance Companies) परमिट की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देकर क्लेम खारिज कर सकती हैं। जिससे बसों में संचालन करने वाले सवारियों के जीवन का संकट एवं उनके परिजनों कों काफ़ी नुकसान होना माना जा सकता है।

बस संचालकों द्वारा अवैध रूप से बस का संचालन एवं मनमाना किराया भी एक बड़ा मुद्धा है :- बिना तय रूट फेयर के यात्रियों से त्योहारों या सामान्य दिनों में भी मनमाना किराया वसूला जा रहा है, जिस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। अगर कोई यात्री अधिक किराया या मनमाना किराया वसूली के विरुद्ध बात करता है तो बस संचालकों के गुर्गे उस यात्री से हुज्जत बाजी एवं धमकी देने से भी पीछे नहीं हटते है।
यदि परिवहन विभाग वास्तव में पारदर्शी है, तो बस अड्डों और सीमावर्ती चेकपोस्टों पर इन बसों की पैसेंजर लिस्ट की औचक जांच की जाए और अंबिकापुर से चढ़ने वाले यात्रियों व बनारस से वापस आने वाले यात्रियों के विवरण का मिलान किया जाए। जिससे अवैध रूप से अंबिकापुर से बनारस एवं बनारस से अंबिकापुर संचालित बसों की पूरी कहानी खुल जाएगी एवं उन अफसरों की भी पोल खुलने में समय नहीं लगेगा जिसके दलाली से यह बस अवैध तरीके से संचालित हो रही है।
बहुत जल्द सरगुजा समय की टीम उन बस संचालकों का नाम बस का नाम एवं आर टी ओ अफसर की दलाली का विस्तार से खबर के माध्यम से आप सभी पाठकों कों अवगत कराएँगे।
सबसे बड़ी बात एवं विडंबना देखिए की ये आर टी ओ अफसर अपने आप कों मुख्यमंत्री से कम नहीं समझते इनके ही दलाली पूर्वक कार्य की जानकारी लेने के लिए फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया जाता है लेकिन ये जनाब फोन उठाना जरुरी नहीं समझते।
