सरगुजा समय अंबिकापुर :- लाइव अपडेट्स और वीडियो से गूंजता रहा सोशल मीडिया, फिर भी
सरगुजा समय अंबिकापुर :-
लाइव अपडेट्स और वीडियो से गूंजता रहा सोशल मीडिया, फिर भी नहीं पसीजा प्रशासनिक अमला।
हाथ जोड़ते, मिन्नतें करते छात्राओं के पीछे दौड़ते रहे सहायक आयुक्त ललित शुक्ला; पर नहीं थमे बेटियों के कदम।
कलेक्टर तक पहुंचने की जिद में बेहोश हुई छात्रा; बड़ा सवाल—आखिर मासूमों को 30 किमी पैदल चलने पर किसने किया मजबूर?
सरगुजा समय अंबिकापुर: आदिवासी बेटियों के हक, शिक्षा और सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे सोमवार को बतौली से अंबिकापुर की सड़क पर 30 किलोमीटर तक घिसटते नजर आए। शिवपुर एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय की दर्जनों छात्राएं जब हॉस्टल की बदहाली और प्रबंधन की मनमानी से तंग आकर सड़क पर उतरीं, तो उनके पैरों में पड़े छाले सिस्टम की असंवेदनशीलता की गवाही दे रहे थे।
सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि जब छात्राएं चिलचिलाती धूप में भूख-प्यास से बेहाल होकर एक-एक किलोमीटर नाप रही थीं, तब जिले के मुखिया यानी कलेक्टर साहब अपने वातानुकूलित (AC) चेंबर में बैठकर उनके आने का इंतजार करते रहे।

पग-पग की खबर वायरल, फिर भी नहीं हिली प्रशासनिक कुर्सी:-
यह कोई छुपा हुआ आंदोलन नहीं था। बतौली से लेकर अंबिकापुर तक छात्राओं के हर कदम की तस्वीरें, वीडियो और अपडेट्स मीडिया और सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहे थे। फोन घनघना रहे थे, प्रशासनिक ग्रुपों में मैसेज तैर रहे थे। ऐसे में सवाल उठता है कि AC कारों के काफिले में चलने वाले कलेक्टर खुद आगे बढ़कर बीच रास्ते में उन बेटियों से मिलने क्यों नहीं पहुंचे? क्या एक संवेदनशील प्रशासनिक प्रमुख का यह फर्ज नहीं था कि वह चेंबर का मोह छोड़ खुद सड़क पर उतरते और रोती-बिलखती छात्राओं का दर्द सुनकर उन्हें वहीं से सुरक्षित वापस भेजते?

हाथ जोड़ते रहे सहायक आयुक्त, लेकिन कलेक्टर तक नहीं पहुंची आवाज? :- मामले को दबाने और अपनी साख बचाने के लिए प्रशासन ने सहायक आयुक्त आदिवासी विकास, ललित शुक्ला को मैदान में उतार दिया। शुक्ला जी पूरे रास्ते छात्राओं के आगे-पीछे हाथ जोड़कर विनती करते नजर आए कि वे कलेक्टर दफ्तर न जाएं और बात मान लें। मगर छात्राओं का आक्रोश इतना गहरा था कि उन्होंने मान-मनौव्वल को ठुकरा दिया और सीधे कलेक्टर से जवाब मांगने की जिद पर अड़ी रहीं। जब सहायक आयुक्त रास्ते भर छात्राओं के साथ मौजूद थे और पल-पल का हाल मुख्यालय भेज रहे थे, तो क्या कलेक्टर को छात्राओं की शारीरिक और मानसिक स्थिति का इल्म नहीं था?

कलेक्टरेट की चौखट पर टूटी हिम्मत, छात्रा बेहोश:- 30 किलोमीटर की अंतहीन और थकाऊ दूरी तय कर जब छात्राएं कलेक्टरेट परिसर पहुंचीं, तो थकान और कमजोरी से एक छात्रा चक्कर खाकर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। कलेक्टरेट में चीख-पुकार और अफरा-तफरी मच गई। तब जाकर प्रशासन को अपनी चूक का अहसास हुआ और आनन-फानन में प्राथमिक उपचार की व्यवस्था की गई।

सियासी वार: ‘आदिवासी बच्चों के पैसे की बंदरबांट’
घटना पर तीखा हमला बोलते हुए पूर्व कैबिनेट मंत्री अमरजीत भगत ने कहा: “आदिवासी अंचल के बच्चों के पोषण, आवास और पढ़ाई के लिए सरकार करोड़ों की राशि देती है, लेकिन धरातल पर अधिकारियों की मिलीभगत से बंदरबांट चल रहा है। बेटियां बुनियादी सुविधाओं के लिए 30 किलोमीटर पैदल चलें और प्रशासन तमाशा देखता रहे, यह आदिवासी समुदाय का खुला अपमान है।”

कलेक्टर का औपचारिक बयान:- घंटों चले यात्रा और छात्रा के बेहोश होने के बाद कलेक्टर अजीत वसंत ने मामले को सामान्य बताते हुए कहा की “छात्राएं बिजली व्यवस्था सहित तीन मुख्य मांगों को लेकर पहुंची थीं। संबंधित विभागीय अधिकारियों को छात्रावास की व्यवस्थाएं तत्काल सुधारने के निर्देश दे दिए गए हैं।”

सरगुजा समय का तीखा सवाल:– शिवपुर एकलव्य विद्यालय की छात्राओं को 30 किलोमीटर पैदल चलने पर आखिर किसने मजबूर किया? क्या हॉस्टल के लापरवाह अधीक्षक-प्रिंसिपल पर सीधी गाज गिरेगी, या फिर चंद औपचारिक निर्देशों की लीपापोती कर फाइलें बंद कर दी जाएंगी? और सबसे अहम—जिले की प्रशासनिक संवेदनशीलता आखिर किस AC चेंबर में कैद होकर रह गई है?
