अंबिकापुर: जिला अस्पताल के 3-3 नोटिस को डॉक्टर संदीप त्रिपाठी ने दिखाया ठेंगा! 10 माह से नदारद पर विभाग मौन, निलंबन और बर्खास्तगी की फाइल पर किसने मारी कुंडली?
मरीजों को अपाहिज बनाने, आयुष्मान में करोड़ों की हेराफेरी और 50 डिसमिल में नया साम्राज्य खड़ा करने के आरोपों के बीच स्वास्थ्य महकमे की संदेहास्पद चुप्पी; जांच का विषय—आखिर किसके दबाव में रुका एक्शन?
अंबिकापुर में ‘हैवानियत’ का अड्डा बना दयानिधि अस्पताल! डॉक्टर बना कसाई: गलत इलाज से दर्जनभर मरीज जिंदगी भर के लिए अपाहिज, अस्पताल संचालन के शुरुवाती 3 वर्ष में महज 09 बेड के अस्पताल से आयुष्मान के नाम पर लगभग 6 करोड़ की खुली लूट पर कार्यवाही में किसके इशारे में मिल रही छूट?

क्या दयानिधि निजी अस्पताल में कोई भी ऑर्थोपेडिक डॉक्टर अब अपनी डिग्री नहीं लगा रहा जिससे मज़बूरी में डॉक्टर संदीप त्रिपाठी कों शासकीय सेवा में बीमार होने का हवाला देकर छुट्टी के लिए आवेदन किया गया एवं 10 माह तक कोई ऑर्थोपेडिक डॉक्टर अपनी डिग्री देने कों तैयार नहीं जिसके कारण संदीप त्रिपाठी अपने सरकारी नौकरी में वापस नहीं जा पा रहें है क्योंकि शासकीय सेवक डॉक्टर अपनी डिग्री से या तो अपना निजी अस्पताल चलाएगा या सरकारी नौकरी करेगा?
विशेष खोजी रिपोर्ट / सरगुजा समय, अंबिकापुर:- विशुनपुर कन्या परिसर रोड स्थित ‘दयानिधि अस्पताल’ के सर्वेसर्वा और शासकीय सेवक डॉ. संदीप त्रिपाठी की मनमानी और प्रशासनिक अवहेलना का एक और बड़ा प्रमाण सामने आया है। सरकारी नियमों, प्रशासनिक चेतावनियों और कलेक्ट्रेट जनदर्शन की शिकायतों को ताक पर रखकर काम कर रहे इस डॉक्टर को लेकर अब स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली भी गहरे संदेह के घेरे में आ गई है।

विश्वसनीय विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बिना ठोस चिकित्सीय आधार के लगभग 10 महीनों से लगातार ड्यूटी से नदारद रहने के मामले में जिला अस्पताल प्रबंधन द्वारा डॉ. संदीप त्रिपाठी को एक-दो नहीं, बल्कि लगातार तीन-तीन कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notices) जारी किए जा चुके हैं।लेकिन प्रशासनिक हनक और रसूख में चूर डॉक्टर ने इनमें से एक भी नोटिस का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा।

तीन नोटिस बेअसर सिविल सेवा नियमों की उड़ाईं धज्जियां
शासकीय सेवा नियमावली के स्पष्ट प्रावधान हैं कि यदि कोई शासकीय सेवक सक्षम अधिकारी द्वारा जारी लगातार तीन नोटिसों का जवाब नहीं देता है और अनधिकृत रूप से ड्यूटी से अनुपस्थित रहता है, तो उसके विरुद्ध तत्काल प्रभाव से सेवा से निलंबन (Suspension), विभागीय जांच (Departmental Enquiry) शुरू करना एवं अंत में सेवा समाप्ति / बर्खास्तगी (Termination/Dismissal) की कड़ी कार्यवाही हेतु अनुशंसा शासन को भेजी जानी अनिवार्य होती है।

लेकिन अंबिकापुर में स्थिति इसके ठीक उलट है। तीन नोटिसों की समय-सीमा बीत जाने के बाद भी आज दिनांक तक स्वास्थ्य विभाग द्वारा डॉ. त्रिपाठी के विरुद्ध निलंबन या बर्खास्तगी की कोई ठोस कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि नियमों की खुली अवहेलना के बावजूद कार्रवाई की फाइल किस मेज पर और किसके मौखिक आदेश से दबाकर रखी गई है? बीमारी का बहाना, पर लगभग 50 डिसमिल जमीन में नया अस्पताल बनवाने की पूरी फुर्सत!

प्रकरण में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि डॉ. त्रिपाठी पिछले लगभग 10 महीनों से स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में खुद को “गंभीर बीमार” बताकर ड्यूटी से नदारद हैं, जिसके चलते जिला अस्पताल में आने वाले आम गरीब मरीजों को ऑर्थोपेडिक सेवाओं के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है और वही गरीब मरीजों कों दयानिधि अस्पताल के दलाल शासकीय अस्पताल से बहला कर दयानिधि निजी हॉस्पिटल लेकर आ जाते है जहाँ पर सुरु होता है ईलाज के नाम पर नगद एवं आयुष्मान योजना का खेलसूत्रों से मिली जानकारी की माने तो इस तरह मरीजों से नगद एवं नियमविरुद्ध तरीके से आयुष्मान योजना के अवैध कमाई के जरिये संदीप त्रिपाठी ने अरबों रूपए का साम्राज्य खड़ा कर दिया है। जिसकी जाँच तक सरगुजा प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग नहीं करवा पा रही है।

आपको बता दें की हकीकत यह है कि यह ‘बीमार’ डॉक्टर:
दयानिधि अस्पताल में धड़ल्ले से निजी ओपीडी, कंसल्टेशन और सर्जरी का काम संभाल रहा है।सूत्रों के अनुसार, कथित तौर पर आयुष्मान भारत योजना और मरीजों से वसूली गई रकम से लगभग 50 डिसमिल जमीन पर नए,भव्य अस्पताल के निर्माण कार्य की चौबीसों घंटे व्यक्तिगत निगरानी कर रहा है। सरकारी नोटिस का जवाब देने के लिए जो डॉक्टर खुद को अस्वस्थ बताता है, वह निजी क्लीनिक की प्रैक्टिस और करोड़ों के रियल एस्टेट व अस्पताल प्रोजेक्ट को खड़ा करने में पूरी तरह ‘फिट’ नजर आ रहा है।

फर्जीवाड़े,अपाहिज बनाने और ब्लैकमेलिंग का लंबा कच्चा-चिट्ठा:- कलेक्टर जनदर्शन में पीड़ितों द्वारा लगातार दर्ज कराई जा रही शिकायतों ने इस पूरे नेटवर्क की परतें खोल दी हैं जिससे मरीजों के सामने स्थायी लाचारी सामने आने लगी है क्योंकि इतने बड़े कारनामें एवं गलत ईलाज करने के बावजूद कार्यवाही नहीं होना डॉक्टर त्रिपाठी की दबंगई एवं राजनीतिक संरक्षण का होना साफ साफ झलकता है। बता दें की इस संदीप त्रिपाठी के द्वारा राजकुमार श्रीवास्तव और गोविंद जैसे कई मरीजों का गलत ऑपरेशन कर उन्हें उन्हें स्थाई विकलांग बनाने का कार्य किया है वही इन तमाम मरीजों कों जिंदगी भर के लिए अपाहिज बनाने और विरोध करने पर बिचौलियों के जरिए धमकियां व ब्लैकमेलिंग करवाने के गंभीर आरोप भी डॉक्टर त्रिपाठी पर शिकायतकर्ता ने कलेक्टर के पास जनदर्शन के माध्यम से लगाया है

आपकी जानकारी के लिए बता दें की हमने तमाम मामले में आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी थी उस जानकारी में खुलासा हुआ कि अस्पताल में विशेषज्ञ के रूप में डॉ. बी. एस. सेंगर का नाम दर्ज है, जबकि डॉ. सेंगर ने सरगुजा समय के संपादक कों फोन पर मौखिक तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि वे दयानिधि निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं देते ही नहीं हैं।
आयुष्मान का संदिग्ध खेल 9 बेड के अस्पताल के दौरान 3 साल में लगभग 6 करोड़ रुपये के आयुष्मान क्लेम और उसके बाद नोडल प्रभार के दौरान नियमों को दरकिनार कर अस्पताल को 20 बेड में तब्दील करने का संदेहास्पद खेल।

सबसे बड़ी विडंबना यहाँ यह देखेने वाली है कों दयानिधि निजी अस्पताल शुरुआत के लगभग 03 वर्ष 09 बेड का अस्पताल था तबतक इस अस्पताल कों लगभग 6 करोड़ रूपए भुगतान आयुष्मान योजना के तहत किया जा चूका था उसके बाद नर्सिंग होम कों नोडल राजेश संदीप त्रिपाठी के द्वारा अपना खेल खेला गया एवं तमाम कमियों वाला दयानिधि निजी अस्पताल 9 बेड से 11 बेड बढाकर 20 बेड कर दिया गया और कलेक्टर के जाँच आदेश कों मानते हुए वर्तमान तत्कालीन CMHO डॉक्टर मार्को ने जाँच किया और लगातार प्रकाशित हो रहें खबर कों गलत बताते हुए दयानिधि निजी अस्पताल कों 20 बेड का बता दिया जबकि 20 बेड का संचालित दयानिधि अस्पताल संदीप त्रिपाठी के नर्सिंग होम एक्ट के प्रभारी रहते समय हुआ कों की उक्त संचालित दयानिधि अस्पताल इनकी पत्नी के नाम से पंजीकृत है।
अब विचारणीय एवं जाँच करने वाली गंभीर बात यह है की जब उक्त अस्पताल के द्वारा तमाम कमियों के बावजूद 11 बेड बढ़वाकर 20 बेड का अस्पताल संचालन का आदेश प्राप्त कर लिया तो अब 20 बेड के अस्पताल में कितने करोड़ का आयुष्मान से फर्जी भुगतान प्राप्त किया गया होगा यह भी जाँच का विषय है।

प्रशासनिक गलियारों में गूंजता यक्ष प्रश्न: आखिर कार्रवाई क्यों नहीं?
तत्कालीन संयुक्त संचालक (JD) अनिल शुक्ला के पूर्व निर्देशों को नजरअंदाज करना, जिला अस्पताल के तीन-तीन नोटिसों को रद्दी की टोकरी में डाल देना और पीड़ितों की चीखों के बावजूद तत्कालीम सीएमएचओ (CMHO) डॉक्टर मार्को व स्थानीय स्वास्थ्य विभाग का हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना—यह सामान्य प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि गंभीर मिलीभगत और अघोषित संरक्षण की ओर इशारा करता है।

सरगुजा की जनता और पीड़ित अब सीधे शासन से जवाब मांग रहे हैं की क्या स्वास्थ्य विभाग किसी शासकीय डॉक्टर को नियमों से ऊपर मानता है?
जहाँ तीन नोटिसों की अनदेखी के बाद भी डॉक्टर संदीप त्रिपाठी को अब तक निलंबित और बर्खास्त क्यों नहीं किया गया?
क्या इस पूरे मामले की लीपापोती से पर्दा उठाने के लिए शासन स्तर से एसीबी (ACB) और ईओडब्ल्यू (EOW) की संयुक्त टीम द्वारा निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?

इस पुरे मामले में अब देखने वाली बात है की उक्त शासकीय सेवक संदीप त्रिपाठी पर कार्यवाही करने की हिमाकत वर्तमान के CMHO एवं JD स्वास्थ्य विभाग के द्वारा दिखाया जायेगा या फिर ये भी पहले वाले साहबो के ढर्रे में चलते नजर आएंगे।
