सरगुजा समय अंबिकापुर :- उप संचालक डॉ. शुक्ला की दलाली एवं साठगांठ का काला खेल: बिना एक भी उच्चाधिकारी की अनुमति के चुपचाप कर दिया गया 18 लाख का फाइनल पेमेंट।
उप संचालक शुक्ला ने कलेक्टर जनदर्शन पोर्टल को भी नहीं छोड़ा किया डिजिटल फ्रॉड! कागजों में कार्यमुक्त किए गए 6 अधिकारी, धरातल पर मलाईदार कुर्सियों से चिपक कर रहे राज।
प्रशासनिक सनसनी: क्या शासन की आँखों में धूल झोंकने वाले उप संचालक शुक्ला के द्वारा खुलेआम दलाली पूर्वक कार्य करने एवं बड़े सिंडिकेट संचालकों पर गिरेगी गाज या फाइलों में दबेगा भ्रष्टाचार?
सरगुजा समय अंबिकापुर/छत्तीसगढ़:- छत्तीसगढ़ के पशु चिकित्सा विभाग से एक ऐसा सनसनीखेज, आंखें खोल देने वाला और शासन को हिला देने वाला भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है, जिसने पुरे महकमे की साख को तार-तार कर दिया है।
यहां बैठे दलाली पूर्वक कार्य करने वाले उप संचालक डॉ. शुक्ला अपने रसूखदारी एवं राजनीतिक संरक्षण के दम भ्रष्टाचार खुलेआम प्रशासनिक फर्जीवाड़े की सारी हदें पार करते हुए न सिर्फ शासन को लाखों की चपत लगाई है, बल्कि जिला प्रशासन के सर्वोच्च निगरानी तंत्र यानी ‘कलेक्टर जनदर्शन पोर्टल’ को भी झूठी जानकारियों से चकमा दिया है। सबसे आश्चर्य वाली बात यह कितने बड़े कारनामों को करने के बाद भी आज दिनांक तक उक्त डॉक्टर के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई है। यह मामला अब पूरे जिले में चर्चा का सबसे बड़ा और ज्वलंत विषय बन गया है।
मिली जानकारिबके अनुसार आपको बता दें की पदान्नवन (डिमोशन) के बाद डॉ. शुक्ला का शुरू हुआ वसूली दबाने का ‘खेल’ :- यह पूरा घिनौना खेल 2025 में सेवानिवृत्त कर्मचारी श्री आई.डी. सिंह के इर्द-गिर्द घूमता है। श्री सिंह मूल रूप से वैक्सीनेटर (चतुर्थ श्रेणी पद) के पद पर पदस्थ थे, जिन्हें नियमों को ताक पर रखकर पदोन्नति दे दी गई और वे ‘सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी’ (तृतीय श्रेणी पद) बन बैठे। लेकिन पाप छुपता नहीं है; जब उनके प्रमाण पत्रों में फर्जीवाड़ा पकड़ा गया, तो लगभग चार साल की लंबी लीपापोती के बाद विभाग को आखिरकार उन्हें वापस उनके मूल पद (वैक्सीनेटर) पर पदान्नवत (डिमोट) करना पड़ा।
नियमों के मुताबिक, इस चार साल की अवधि में उन्हें मिले उच्च वेतनमान की अतिरिक्त राशि की भारी-भरकम रिकवरी (वसूली) की जानी थी। लेकिन आरोप है कि डॉ. शुक्ला ने अपनी दलाली पूर्वक नीति एवं गहरी साठगांठ कर इस वसूली की फाइल को हमेशा के लिए दफना दिया और शासन के धन पर डाका डालने का रास्ता साफ कर दिया।
फरवरी 2026: नियमों की धज्जियां उड़ाकर 18 लाख का अंतिम भुगतान:- मामला तब और अधिक विस्फोटक हो गया जब इसी वर्ष माह फरवरी 2026 में, बिना किसी सक्षम उच्चाधिकारी की लिखित अनुमति या स्वीकृति के, सेवा से निवृत्त हो रहे श्री आई.डी. सिंह को लगभग 18 लाख रुपये का अंतिम भुगतान (Final Payment) धड़ल्ले से जारी कर दिया गया। इस सुनियोजित आपराधिक लापरवाही और वसूली न होने देने के कारण सीधे तौर पर शासन को लगभग 15 लाख रुपये की आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है। बिना अनुमति के हुआ यह भुगतान सरासर वित्तीय धोखाधड़ी और पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।
उप संचालक डॉ. शुक्ला एवं उनके शागिर्द के डिजिटल फ्रॉड पे कार्यवाही के जगह मौन चुप्पी क्यों : कलेक्टर जनदर्शन पोर्टल पर अपलोड किया गया फर्जी आदेश:- इस पूरे प्रकरण का सबसे चौंकाने वाला और गंभीर पहलू यह है कि विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने जिला प्रशासन को भी नहीं बख्शा। उपसंचालक कार्यालय द्वारा एक पत्र—पत्र क्रमांक 797 / स्थापना / 2026-27, दिनांक 25.08.2026 जारी किया गया। इस पत्र में यह ढिंढोरा पीटा गया कि विभाग के 6 अधिकारी-कर्मचारियों का संलग्नीकरण (Attachment) तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है और उन्हें उनकी मूल पदस्थापना के लिए कार्यमुक्त कर दिया गया है।
अपने इस झूठे और कागजी कारनामे को सही साबित करने के लिए इस पत्र को कलेक्टर जनदर्शन के पोर्टल पर भी गर्व के साथ अपलोड कर दिया गया, ताकि जनता और प्रशासन यह समझें कि विभाग में सब कुछ पारदर्शी और नियमानुसार चल रहा है।
लेकिन जमीन पर हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत थी—इनमें से एक भी अधिकारी-कर्मचारी को वास्तव में कार्यमुक्त नहीं किया गया, वे अपनी पुरानी मलाईदार कुर्सियों पर शान से जमे रहे और जिला प्रशासन को बेशर्मी से गुमराह किया गया।
अब प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट: क्या होगी सख्त कार्रवाई?:- एक तरफ भाजपा सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ पशु चिकित्सा विभाग के भीतर प्रशासनिक आकाओं का यह सिंडिकेट खुलेआम सिस्टम की धज्जियां उड़ा रहा है।
15 लाख की खुली लूट, 18 लाख का अवैध भुगतान और कलेक्टर पोर्टल पर फर्जीवाड़ा करने वाले इस बड़े कांड के बाद अब हर किसी की नजर इस बात पर है कि क्या शासन इन रसूखदार चेहरों (डॉ. शुक्ला व अन्य जिम्मेदार अधिकारियों) पर कोई ठोस और मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई करता है या यह मामला भी फाइलों के कब्रिस्तानों में दफन हो जाएगा।
जिस हिसाब से भ्रष्टाचार में लिप्त उप संचालक डॉ. शुक्ला के ऊपर राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है उस हिसाब से विभाग के मंत्री महोदय का छबि अत्यंत गंभीर रूप से खराब होता नजर आ रहा है। जहाँ पुरे सरगुजा संभाग में भ्रस्टाचारियों पर कार्यवाही की बात सामने आती है वही उस भ्रस्ट अफसर पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने की खबर राजनीतिक एवं विभागीय गलियारों में तहलका मचाते नजर आ ही जाती है।
अब सम्बंधित विभाग के मंत्री जी को भी ऐसे दलाल अफसरों से अपना पल्ला छुड़ाना पड़ेगा जो मंत्री के दामन में भ्रस्ट मंत्री होने का दाग़ लगाने से पीछे नहीं हट रहे। फिर वह सरगुजा के क़ृषि विभाग के उप संचालक पीताम्बर सिंह दीवान हो या उप पशु चिकित्सा सेवाएं के उप संचालक डॉक्टर शुक्ला इन अफसरों को विभागीय मंत्री को स्वयं अपने से किनारा करने की आवश्यकता है क्योंकि ये भ्रष्ट अफसर रूपी विभागीय दलाल नियमविरुद्ध कार्य करते हुए मंत्री तक के पहुंच का धौस दिखाते नजर आते है।
इस प्रकार के अधिकारी उसी प्रकार के जोंक के सामान है जो किसी के शरीर से चिपक गया तो उसका खून चूसते हुए कमजोर कर देगा ठीक इसी प्रकार के भ्रष्ट अफसर मंत्री राम विचार नेताम के जनाधार एवं लोकप्रियता में बंटा लगाते हुए जनाधार घटाने का कार्य कर रहे है।
