कलेक्टर को भेजी गई जांच की अनुशंसा, अधिकांश भूमि घोटालों में सामने आ रही पटवारियों की संलिप्तता बनी गंभीर चिंता का विषय
सरगुजा समय अम्बिकापुर। सरगुजा अंचल में शासकीय जमीनों की हेराफेरी और अवैध खरीद-फरोख्त के मामलों पर प्रशासन ने कड़ा रुख अख्तियार किया है।
अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) धौरपुर की अदालत ने ग्राम लालमाटी स्थित बेशकीमती 2.39 एकड़ (0.967 हेक्टेयर) शासकीय भूमि के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करते हुए पूरे सौदे को शून्य घोषित कर दिया है।
अदालत ने जमीन को पुन: शासकीय मद में दर्ज करने, इसमें लिप्त क्रेता-विक्रेताओं के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराने और अतिक्रमणकारियों को बेदखल करने के कड़े निर्देश दिए हैं। वहीं, पूरे फर्जीवाड़े में तत्कालीन हल्का पटवारी की भूमिका को संदिग्ध पाते हुए उसके खिलाफ विभागीय जांच संस्थित करने की अनुशंसा कलेक्टर (भू-अभिलेख) को भेजी गई है।
अभिलेखों में हेराफेरी कर शासकीय जमीन को बना दिया निजी
मामला राजस्व निरीक्षक मंडल रघुनाथपुर के अंतर्गत आने वाले ग्राम लालमाटी का है। यहां खसरा क्रमांक 70/2 की 2.39 एकड़ जमीन पूर्व में शासकीय मद में दर्ज थी।
राजस्व अभिलेखों, पटवारी प्रतिवेदन एवं दस्तावेजों की सूक्ष्म जांच में यह तथ्य उजागर हुआ कि दस्तावेजों में कूटरचना कर शासकीय भूमि का गैर-कानूनी ढंग से विक्रय कर दिया गया। एसडीएम न्यायालय ने प्रस्तुत दस्तावेजों और पटवारी प्रतिवेदन को पूरी तरह संदेहास्पद व कूटरचित करार देते हुए जमीन की रजिस्ट्री को तत्काल प्रभाव से शून्य घोषित कर दिया।
क्रेता-विक्रेता पर दर्ज होगी नामजद एफआईआर:- अदालत ने धोखाधड़ी के इस खेल में शामिल विक्रेता बंशु लोहार (निवासी ग्राम परसा, तहसील अम्बिकापुर) तथा क्रेता मिस्हाबुल इस्लाम (निवासी मोमिनपुर, अम्बिकापुर) एवं मो. सलीम (निवासी सोस, जिला रांची, झारखंड) के खिलाफ संबंधित थाने में आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने का आदेश दिया है। इसके अलावा, जमीन पर अवैध कब्जा जमाए शिकायतकर्ता रामचन्द्र लकड़ा व अन्य के विरुद्ध छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 248 के तहत बेदखली की कार्रवाई करने के निर्देश नायब तहसीलदार रघुनाथपुर को दिए गए हैं।
पटवारियों की मिलीभगत सबसे गंभीर चिंता:- इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राजस्व महकमे के निचले स्तर पर फैले भ्रष्टाचार को बेनकाब कर दिया है। जिले में लगातार सामने आ रहे भूमि फर्जीवाड़ों की पड़ताल करें तो अधिकांश मामलों में हल्का पटवारियों की सीधी संलिप्तता या मूक सहमति साफ उजागर होती है।
मूल शासकीय रिकॉर्ड को दबाना, फर्जी मिसल और खसरे तैयार करना तथा जांच अधिकारियों को गुमराह करने वाले त्रुटिपूर्ण पंचनामे बनाना मानों एक नियमित परिपाटी बन चुका है।
लालमाटी प्रकरण में भी तत्कालीन हल्का पटवारी सुरेश कुमार दाहिरे द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन और पंचनामा घोर त्रुटिपूर्ण पाया गया, जिसके चलते उनके विरुद्ध विभागीय जांच की सिफारिश की गई है। जमीनों के इस संगठित खेल में मैदानी राजस्व अमले की संलिप्तता न केवल प्रशासनिक साख पर बट्टा लगा रही है, बल्कि सरकारी संपत्तियों के संरक्षण पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
