सरगुजा समय अंबिकापुर :- सरगुजा में रिंग बांध तालाब की 57 डिसमिल बेशकीमती शासकीय भूमि को फर्जीवाड़े की भेंट चढ़ाने के मामले में अब आग सिर्फ भू-माफिया तक सीमित नहीं रहने वाली। मास्टरमाइंड आजाद इराकी के सलाखों के पीछे जाने और प्रशासन द्वारा उसकी जमानत के खिलाफ कोर्ट में मोर्चा खोलने के बाद अब तीर सीधे राजस्व अमले की ओर मुड़ना लगभग तय हैं।
शहर के गली-चौराहों से लेकर प्रशासनिक गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है—”भू-माफिया ने जालसाजी की, कागजात रचे, लेकिन जमीन को रिकॉर्ड में चढ़ाने वाली पटवारी की कलम किसके इशारे पर चली?”
जिस देश में भूमि मामले में बिना पटवारी की रिपोर्ट के ‘घास का तिनका’ भी नहीं हिलता, वहां 57 डिसमिल जमीन बड़े आराम से पार हो गई!
राजस्व संहिता का सीधा नियम है कि गांव या हल्के की जमीन का पहला और आखिरी कस्टोडियन हल्का पटवारी होता है। किसी भी नामांतरण (Mutation), फौती दर्ज करने या बटांकन के लिए मौका जांच (Spot Inspection) और पंचनामा तैयार करना पटवारी की अनिवार्य वैधानिक जिम्मेदारी है।
ऐसे में गंभीर सवाल उठ रहे हैं:– जिंदा को मृत दिखाने का पंचनामा किसने बनाया? एक जीवित व्यक्ति का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र लगा और राजस्व रिकॉर्ड में फौती दर्ज कर जमीन दूसरों के नाम चढ़ा दी गई। क्या पटवारी ने मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) नहीं किया?
तालाब मद की जमीन को निजी खाते में कैसे बदला? खसरा और मिसल रिकॉर्ड में रिंग बांध तालाब की यह जमीन शासकीय दर्ज थी। शासकीय मद की भूमि की प्रकृति बदलने की रिपोर्ट देने से पहले पटवारी की आंखें क्यों बंद थीं?
मौन सहमति या संगठित साझेदारी? जब तक क्षेत्रीय पटवारी अपनी जांच आख्या (Report) तहसीलदार या नायब तहसीलदार के न्यायालय में पेश नहीं करता, तब तक कोई भी आदेश पारित नहीं हो सकता। साफ है कि पटवारी की भूमिका सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है।
महज निलंबन नहीं, सीधे BNS के तहत दर्ज हो सह-अभियुक्त के रूप में FIR:- सरगुजा की सजग जनता और जागरूक अधिवक्ताओं की मांग है कि इस मामले में खानापूर्ति वाली विभागीय जांच बंद हो और कड़ाई से जाँच करते हुए तत्कालीन पटवारी के कार्यशैली की भी जाँच हो और दोषी पाए जाने पर पटवारी को बनाया जाए सह-अभियुक्त: जब आजाद इराकी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2) और 61(2) (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है, तो उस षड्यंत्र का सीधा हिस्सा बनने वाले तत्कालीन हल्का पटवारी पर भी इन्हीं धाराओं में नामजद केस दर्ज होना चाहिए।
कार्यकाल की सभी फाइलों की स्क्रूटनी: जिस दौरान यह फर्जीवाड़ा हुआ, उस पूरे कार्यकाल में उक्त पटवारी द्वारा पारित कराई गई फौती, नामांतरण और सीमांकन की नस्तियों की फॉरेंसिक और उच्चस्तरीय जांच हो।
संपत्ति की आर्थिक जांच: करोड़ों की सरकारी जमीन को निजी माफिया की झोली में डालने के एवज में पटवारी और संबंधित बिचौलियों के खातों व बेनामी संपत्तियों की जांच ईओडब्ल्यू (EOW) या एसीबी (ACB) के दायरे में लाई जाए।
प्रशासन की अगली अग्निपरीक्षा: क्या महकमे के भीतर चलेगा बुलडोजर?:- जिला प्रशासन ने आरोपी आजाद इराकी की जमानत के खिलाफ सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका दायर करने का ऐलान कर यह तो दिखा दिया कि वह इस लैंड स्कैम को दबाने के मूड में नहीं है। लेकिन प्रशासन की साख इस बात पर टिकेगी कि क्या कार्रवाई केवल बाहरी दलालों तक सिमट कर रह जाएगी, या फिर सरकारी अभिलेखों से खिलवाड़ करने वाले भीतर के ‘विभीषण’—तत्कालीन पटवारी—पर भी कानूनी शिकंजा कसेगा
