सरगुजा समय अंबिकापुर: क्या अंबिकापुर नगर निगम का प्रशासन ‘यादाश्त खो चुका है’ या फिर यह भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की एक सोची-समझी साजिश है? शहर के हृदय स्थल थाना चौक (गुरुनानक चौक) पर स्थित लाखों की लागत से बना सार्वजनिक शौचालय अब केवल एक ‘किस्सा’ बनकर रह गया है। हकीकत यह है कि न तो वहां शौचालय बचा है और न ही निगम के पास इसके टूटने का कोई रिकॉर्ड।
दस्तावेजों में शौचालय ‘गायब’, लेकिन सबूत अब भी मौजूद!
नगर निगम द्वारा RTI में दिया गया जवाब—”कोई जानकारी नहीं”—अपने आप में एक बड़ा भ्रष्टाचार का प्रमाण है। एक ऐसा शौचालय जो शहर के सबसे व्यस्त चौक पर खड़ा था, उसे जमींदोज कर दिया गया, मलबा हटा दिया गया, और निगम के अधिकारी यह दावा कर रहे हैं कि उन्हें भनक तक नहीं लगी। यह लापरवाही है या मिलीभगत? यदि सरकारी संपत्ति कागजों से गायब हो सकती है, तो शहर की सुरक्षा और विकास की जिम्मेदारी किस भरोसे है?
सार्वजनिक शौचालय को जमीदोज करने वाले दोषियों पर ‘अज्ञात’ के नाम पर खुली छूट?
सवाल यह है कि अगर शौचालय को किसी ने तोड़ा, तो उस पर ‘सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम’ के तहत FIR क्यों नहीं हुई?
मलबा कहां गया? लाखों की ईंटें, लोहे के सरिये और निर्माण सामग्री का मलबा रातों-रात गायब होना इस बात का प्रमाण है कि इसे सुनियोजित तरीके से बेचा गया।
थाना चौक के ठीक बगल में स्थित इस संपत्ति को तोड़ने के लिए भारी मशीनों का उपयोग हुआ होगा, क्या निगम के जिम्मेदार इंजीनियरों को इसकी जानकारी नहीं मिली?
प्रशासनिक चुप्पी: रसूखदारों को ‘क्लीन चिट’ की साजिश?
दो साल का लंबा वक्त बीत चुका है। इतने समय में नगर निगम का एक भी जिम्मेदार अधिकारी यह पता नहीं लगा पाया कि सरकारी संपत्ति किसने तोड़ी? यह चुप्पी इस बात की ओर इशारा करती है कि तोड़फोड़ करने वाले ‘रसूखदार’ इतने शक्तिशाली हैं कि निगम के आला अधिकारी भी उनके सामने कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं। विभाग का ‘अनभिज्ञ’ होना जनता के साथ सीधा धोखा है।
सार्वजनिक शौचालय जमीदोज मामले में अंबिकापुर के नागरिकों की नगर निगम को खुली चेतावनी?
थाना चौक का सार्वजनिक शौचालय ढहाए जाने का मामला अब केवल एक निर्माण के गिरने का नहीं, बल्कि प्रशासनिक अराजकता का प्रतीक बन गया है।
यदि निगम के पास रिकॉर्ड नहीं है, तो जवाबदेह कौन?
क्या नगर निगम का रिकॉर्ड रूम इतना कमजोर है कि लाखों की संपत्ति बिना किसी आदेश के गायब हो जाती है? या फिर जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया हैं और सार्वजनिक शौचालय को जमीदोज कर दिया उनपर कार्यवाही करने की हिमाकत विभाग नहीं कर पा रहा हैं।
शहर के जागरूक नागरिकों का सीधा सवाल:
“यदि नगर निगम इस मामले में FIR दर्ज नहीं करवाता, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि विभाग भी इस भ्रष्टाचार में बराबर का हिस्सेदार है।”
अब समय आ गया है कि जनता यह पूछे कि अंबिकापुर में कानून का शासन है या ‘रसूखदारों’ की मनमर्जी? यदि जल्द ही दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला ‘भ्रष्टाचार के बड़े कांड’ के रूप में दर्ज होगा, और नगर निगम को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

