14/10/2026
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सरगुजा समय रामानुजगंज (बलरामपुर-रामानुजगंज):– शासन की आंखों में धूल झोंककर गरीबों और किसानों के हक के करोड़ों रुपयों की बंदरबांट करना कितना आसान है, इसका जीता-जागता प्रमाण बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में देखने को मिल रहा है।

जल संसाधन विभाग में मनरेगा मद से स्वीकृत जलाशयों के कार्यों में ₹24.29 लाख से अधिक की खुली डकैती का खुलासा हुए वर्षों बीत गए, खुद विभाग के कार्यपालन अभियंता ने थाने में नामजद शिकायत देकर जांच और कानूनी कार्रवाई की गुहार लगाई, लेकिन नतीजा शून्य रहा। 


सवाल यह है कि उपअभियंता सुजीत कुमार गुप्ता और कंप्यूटर ऑपरेटर सुरेन्द्र कुमार सिंह के सिर पर ऐसा किसका हाथ है कि सरकारी खजाने में डाका डालने के बाद भी इनका बाल भी बांका नहीं हुआ? 


खुली लूट का कच्चा चिट्ठा: कागजों पर काम, जेब में सरकारी धन दस्तावेजों के मुताबिक, वर्ष 2017 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत दो बड़ी परियोजनाएं स्वीकृत की गई थीं जिसमें ककनेशा जलाशय (वाड्रफनगर) पुलिया सह तटबंध निर्माण कार्य में ₹17,47,655.75 का सीधा गबन। 


देवीगंज जलाशय (रामचन्द्रपुर):- वेस्ट वियर और स्लूज मरम्मत कार्य के नाम पर ₹6,82,019.60 की हेराफेरी। विभागीय जांच में स्पष्ट तौर पर यह साबित हुआ कि कुल ₹24,29,675.35 की भारी वित्तीय अनियमितता की गई है। वर्ष 2018 में जुर्म साबित, 2022 में थाने में शिकायत बावजूद उसके तत्कालीन थाना प्रभारी ने कार्यवाही करने के बजाये मामले कों दबाना आसान समझा और आज तक मामला दबा दिया गया है।


कार्यपालन अभियंता, जल संसाधन संभाग क्र.-02, रामानुजगंज के पत्र (क्र./1035/शिकायत/2022, दिनांक 06.05.2022) ने पूरे सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। पत्र में साफ लिखा है। जिसमें प्रथम दृष्टया मुख्य दोषी: उपअभियंता सुजीत कुमार गुप्ता (निवासी रामानुजगंज) और कंप्यूटर ऑपरेटर सुरेन्द्र कुमार सिंह (निवासी ग्राम-सेंदूर) इस गबन के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। 


वर्ष 2018 से प्रमाणित है गड़बड़ी: कार्यालयीन पत्र क्र. 4131/स्था/2018 (दिनांक 11.07.2018) से ही इन दोनों की संदिग्ध गतिविधियां और मनरेगा में की गई अनियमितताएं प्रमाणित हो चुकी थीं। 


अधिकारी का दर्द: कार्यपालन अभियंता ने स्वयं लिखा कि “आज दिनांक तक उक्त दोनों के विरुद्ध जाँच कर कार्यवाही नहीं किया गया जो कि अत्यंत खेद का विषय है, जिससे भविष्य में भी शासन की लाभकारी योजनाओं पर विपरीत असर पड़ सकता है”। 


तत्कालीन थाना प्रभारी की संदिग्ध चुप्पी: क्या थाने में बिक गई फाइल? :- इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और सनसनीखेज सवाल रामानुजगंज थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी की कार्यशैली पर खड़ा होता है। जब एक क्लास-वन गैजेटेड अधिकारी (कार्यपालन अभियंता) बकायदा पत्र क्रमांक और पूर्व जांच के संलग्नकों के साथ 6 मई 2022 को थाने में लिखित शिकायत सौंपता है, तो पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की? 


24 लाख रुपये से अधिक के सरकारी गबन के इस संगीन मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी ने जांच को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया? 
क्या पुलिस को कोई बड़ा ‘हिस्सा’ मिला था या फिर किसी सफेदपोश राजनीतिक आका के एक फोन पर कानून के हाथ बांध दिए गए?


आखिर सुजीत गुप्ता को किसका खुला संरक्षण?
एक उपअभियंता और एक संविदा/दैनिक ऑपरेटर की इतनी हैसियत कैसे हो सकती है कि वे 24 लाख रुपये से ज्यादा का घोटाला कर जाएं, विभाग में उनके खिलाफ जांच साबित हो जाए, थाने में शिकायत पहुंच जाए और फिर भी वे खुलेआम कॉलर ऊंची करके घूमें? 


क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि सुजीत गुप्ता का भ्रष्टाचार केवल अपनी जेब भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस काली कमाई का हिस्सा ऊपर तक बंटता रहा है। इसी ‘कमीशनखोरी’ के सिंडिकेट के दम पर उपअभियंता आज भी बेखौफ अपनी कुर्सी पर काबिज है या कानूनी शिकंजे से महफूज है।


अब आर-पार की मांग: नपेगा कौन?:- यह केवल दो जलाशयों की मरम्मत का घोटाला नहीं है, बल्कि मनरेगा के तहत पसीना बहाने वाले उन गरीब मजदूरों के पेट पर लात है जिनका हक मारकर यह गबन किया गया। 


क्या शासकीय दायित्वों में घोर लापरवाही बरतने और 24 लाख के घोटाले पर पर्दा डालने वाले रामानुजगंज तत्कालीन थाना प्रभारी के विरुद्ध भी आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज होगा?


जनता अब पूछ रही है:- क्या जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक इस पुराने मामले की धूल फांक रही फाइल को बाहर निकालकर तत्काल एफआईआर दर्ज कराएंगे? क्या गबन करने वाले सुजीत गुप्ता और सुरेंद्र सिंह से ब्याज सहित सरकारी राशि की वसूली होगी और उन्हें सलाखों के पीछे भेजा जाएगा? 


अब देखना यह है कि प्रशासन भ्रष्टाचारियों को जेल भेजता है या फिर यह पूरा मामला किसी रसूखदार की मेहरबानी के नीचे हमेशा के लिए दफन कर दिया जाएगा।

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