सरगुजा समय अंबिकापुर/रायगढ़ मार्ग: छत्तीसगढ़ में अपनी राजनीति चमकाने के लिए प्रतिदिन नए नए आयाम अपनाये जा रहे है वही बात करें सरगुजा की तो सरगुजा में राजनीतिक चमचागिरी और पाखंड जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चूका है ऐसा माना जा सकता है यह हम नहीं कहा रहे बल्कि सरगुजा भाजपा के एक नेता द्वारा अपने फेसबुक पोस्ट में किए गए दो अलग अलग किए गए पोस्ट स्वयं कह रहे है।

कहते है की राजनीति में अगर चमचागिरी का हुनर बढ़िया है तो खुद के थूके हुए शब्द ही चेहरे पर कालिख बनकर चिपक जाते हैं। सोशल मीडिया पर खुद को व्यवस्था का सबसे बड़ा वकील और पत्रकारिता का ‘सर्टिफ़िकेट बांटने वाला’ समझने वाले एक फेसबुकिया नेताजी की ऐसी ही भद्द पिटी है, जिसे देखकर आम जनता और सोशल मीडिया यूज़र्स भी कह रहे हैं—कथनी और करनी का ऐसा नंगा नाच पहले कभी नहीं देखा गया!

पहला तमाशा: कलम की तुलना ‘रखैल’ से, गड्ढों को बताया ‘महज चार गड्ढे’ अभी कुछ ही दिन पहले 2 सितंबर को ज्ञान का ऐसा झरना बहाया गया मानो जनता की कमर तोड़ती सड़कें कोई मुद्दा ही न हों। बदहाल सड़कों और जानलेवा गड्ढों पर आवाज़ उठाने वाले स्थानीय पत्रकारों और आलोचकों को खरी-खोटी सुनाते हुए फेसबुक पर लिखा गया: “चार गड्ढों के लिए सरकार को पास या फेल मत बनाइए ! और भी विषय हैं राजनीति से इतर शब्द-विलास के लिए अपनी कलम को किसी दल की रखैल मत बनाइए !!” इस ज़हरीली और अमर्यादित भाषा के ज़रिए सड़क के गड्ढों को ‘सिर्फ चार गड्ढे’ कहकर खारिज किया गया और जो लोग जनता के दर्द को लिख रहे थे, उनकी कलम की तुलना सीधे ‘रखैल’ से कर दी गई। संदेश साफ था—सड़क के गड्ढों पर सरकार से सवाल पूछना पाप है, और पूछने वाले किसी दल के दलाल हैं!

दूसरा तमाशा: जब सड़क पर उतरी मशीन, तो ‘दलाली’ चमकाने हाथ में उठा लिया बेलचा लेकिन चमचागिरी की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती। चंद रोज़ बीते और उसी भारत माता चौक से रायगढ़ मार्ग की जर्जर सड़क पर जब प्रशासन और लोक निर्माण विभाग को मजबूरन मरम्मत का काम शुरू करना पड़ा, तो वही महाशय सबसे आगे खड़े मिले।

विशालकाय अर्थमूवर और ग्रेडर जैसी भारी-भरकम मशीनें जब गिट्टी को बराबर कर रही थीं, तब खुद को लाइमलाइट में लाने की भूख इस कदर हावी हुई कि जनाब मशीन के पहिए के ठीक बगल में हाथ में बेलचा (फावड़ा) लेकर तानकर खड़े हो गए। जिस सड़क पर धूल उड़ रही थी, वहां जनता को दिखाने के लिए फोटो खिंचवाई गई कि मानों पूरे मार्ग के गड्ढे किसी सरकारी बजट से नहीं, बल्कि नेताजी के इसी ‘बेलचे’ से भरे जा रहे हों!

पास-फेल का सबसे बड़ा पाखंड: अब कौन दे रहा है नंबर?
जिस शख्स ने कल तक जनता और पत्रकारों को नसीहत दी थी कि “चार गड्ढों पर सरकार को पास या फेल मत बताओ”, आज वही शख्स: अंबिकापुर SDM, तहसीलदार एवं भाजपा जिलाध्यक्ष और भारी अमले के बीच माइक-कैमरे के आगे खड़ा होकर खुद ही सरकार को ‘पास’ करने का प्रमाण पत्र सोशल मीडिया पर ढोल पीटकर बांट रहा है।
कल तक जो गड्ढे ‘मामूली’ थे, आज अपनी पोस्ट में उन्हीं गड्ढों को लेकर लिखता है कि “आवागमन में होने वाली बृहद परेशानियों को देखते हुए…”—यानी जब मीडिया उठाए तो ‘चार गड्ढे’, और जब खुद फोटो खिंचवानी हो तो ‘बृहद परेशानी’! मशीन के चलने के दौरान केवल सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए जबरन बेलचा थामकर खड़ा होना जनसेवा नहीं, बल्कि सरकार की सरेआम भद्द पिटवाना और चाटुकारिता का खुला मुज़ाहिरा है।

जनता का सीधा सवाल: रखैल कौन? सड़क की मरम्मत का ढोंग और फ़ोटोबाज़ी देखकर अब लोग सीधे सवाल दाग रहे हैं:
सच्चाई दिखाने वाली पत्रकारिता गलत थी या सत्ता की दलाली में कल गड्ढों को नकारने और आज उन्हीं गड्ढों पर बेलचा लेकर नौटंकी करने वाली यह दोहरी मानसिकता? दूसरों की कलम को बिकने का ताना देने वाले आज खुद मशीन के आगे बेलचा लेकर साबित कर चुके हैं कि जनता की तकलीफों से उनका कोई सरोकार नहीं, उनका पूरा वजूद केवल फोटो खिंचवाने, चाटुकारिता करने और सोशल मीडिया पर ज्ञान बघारने तक ही सीमित है।
