सरगुजा समय अंबिकापुर :-
नियमों को ताक पर रखकर विदेश घूमने वाला पटवारी बना ‘संरक्षण’ का केंद्र, सूचना देने से कतरा रहे अधिकारी, कार्यवाही के जगह बचाने की क्यों पड़ रही मज़बूरी क्या इस त्रिभुवन सिंह पटवारी के अवैध तरीके से विदेश यात्रा करने के राह में आला अफसर भी तो अवैध तरीके से विदेश यात्रा करके तो वापस नहीं आ गये हैं, जिस कारण त्रिभुवन सिंह पटवारी कर कार्यवाही की लटकती तलवार स्वयं के साख के ऊपर पर गिरती नजर आ रही हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बता दे की त्रिभुवन सिंह एक साधारण सा पटवारी नहीं हैं जिसके ऊपर कार्यवाही करने का साहस राजस्व विभाग के आला अफसर कर पाए, यह वह जमीन माफिया हैं? जिसके संरक्षण में ना जाने और कितने भू माफिया पनाह लिए फिर रहे हैं जिसमें इस पटवारी का एक मुख्य मित्र एक शिक्षक हैं जो की अपनी नौकरी भी इसी पटवारी के हिसाब से दाव पर लगा कर जमीन दलाली करने में मगन हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दे की त्रिभुवन सिंह के विदेश यात्रा मामले में उच्च अधिकारियों की भूमिका पर मुख्य रूप से सवाल हैं, जिसमें शहर का एक तहसीलदार पटवारी त्रिभुवन सिंह को बचाने की पुर जोर कोशिश कर रहा हैं, उस पर यह आरोप हम नहीं लगा रहे बल्कि शहर के स्थानीय नागरिकों और जागरूक लोगों द्वारा आरोप लगाया जा रहा है कि आला अधिकारियों का यह मौन किसी बड़े अफसर के इशारे पर किया जा रहा है। नियम विरुद्ध तरीके से विदेश यात्रा करना और फिर उसे छुपाना, यह सीधे तौर पर पदीय दायित्वों का उल्लंघन हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दे की त्रिभुवन सिंह पटवारी के मामले में RTI के तहत जानकारी चाही गई लेकिन अफसर RTI मामले में जानकारी देने के बजाय ‘लुका-छिपी’ का खेल खेलना प्रारम्भ कर दिए…
सूचना का अधिकार (RTI) लोकतंत्र का वह हथियार है जो अंधेरे में छिपे भ्रष्टाचार को बेनकाब करता है। लेकिन इस मामले में RTI आवेदनों का जवाब देने के बजाय फाइलों को इधर से उधर घुमाया जा रहा है। जन सूचना अधिकारी का यह रवैया संकेत देता है कि यह महज एक ‘विभागीय देरी’ नहीं, बल्कि एक ‘सुनियोजित बचाव’ है। जहाँ आवेदक को जन सूचना अधिकारी से गोल मोल जवाब देने एवं नियम के विपरीत कार्य करने के मामले में प्रथम अपीलीय अधिकारी से मामले की जानकारी चाही तो साहब जन सूचना अधिकारी से दो कदम आगे बढ़ते हुए त्रिभुवन सिंह को बचाने का कार्य करते हुए आवेदक को भ्रमित करने का प्रयास किया गया जिसका अंदाजा आवेदक को पहले से ही था जिसके कारण आवेदक ने पहले ही राज्य सूचना आयोग को मामले में जानकारी के लिए आवेदन भेजा जा चूका हैं।
सूत्रों की मानें तो त्रिभुवन सिंह मामले में सिर्फ ‘अनुमति’ का ही उल्लंघन नहीं हुआ है, बल्कि यात्रा के दौरान किए गए खर्च के स्रोत पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अधिकारियों की यह चुप्पी यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं यह किसी बड़ी मिलीभगत का ‘बलि का बकरा’ बनने से बचने का उपक्रम तो नहीं है?
इस पुरे मामले में एक तहसीलदार की मिलीभगत होने की बात सामने आ रही हैं एवं जानकारी यहाँ तक मिला हैं की भू माफियाओ एवं जमीन दलाली करने वाले कुल तीन पटवारियों को किसी सज्जन भू माफिया ने चार चक्का वाहन गिफ्ट भी किया हैं, परन्तु राजस्व विभाग के आला अफसर इस पटवारी पर कार्यवाही करने के जगह इस पटवारी का चरण वंदन क्यों कर रहे हैं यह विचारणीय बात हैं।
खैर अंत में हम फिर वही वाली कहावत कहेंगे की बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी……

