07/08/2026
20260807_100847

सरगुजा समय अंबिकापुर :- सरगुजा जिले की प्रशासनिक व्यवस्था में बैठे कुछ जिम्मेदार अधिकारी किस


सरगुजा समय अंबिकापुर :- सरगुजा जिले की प्रशासनिक व्यवस्था में बैठे कुछ जिम्मेदार अधिकारी किस हद तक तानाशाही पर उतर आए हैं, इसका एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है। अपर कलेक्टर एवं अपीलीय प्राधिकारी सुनील नायक की कार्यशैली एक बार फिर कटघरे में है।

भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं पर पर्दा डालने के लिए आरटीआई (सूचना का अधिकार) जैसे जनता के कानूनी अधिकार का गला घोंटने का घिनौना खेल बेनकाब हुआ है। जिला पंचायत के खर्चों का कच्चा-चिठ्ठा मांगने वाले एक जागरूक आवेदक की आवाज को दबाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी ने जिस तरह का फर्जीवाड़ा किया है, उसने अधिकारियों की नीयत पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।


यहाँ पढ़े कैसे अपीलर्थी को भ्रमित कर रहे, क्या है पूरा काला खेल? मामला शुभांकुर पाण्डेय द्वारा दायर किए गए उस आरटीआई आवेदन से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने जिला पंचायत, सरगुजा के विभिन्न मदों में मिली करोड़ों की आबंटित राशि और उसके एवज में किए गए भारी-भरकम खर्च व बिल-वाउचर की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। जब जन सूचना अधिकारी ने भ्रष्टाचार छिपने के डर से जानकारी देने से टालमटोल किया, तो मामला अपीलीय प्राधिकारी (अपर कलेक्टर सुनील नायक) के दरबार में पहुंचा।


लेकिन न्याय करने की कुर्सी पर बैठे साहब ने पारदर्शिता का गला घोंटते हुए 22 जुलाई 2026 को एकतरफा आदेश पारित कर अपील ही खारिज कर दी। तर्क यह गढ़ा गया कि आवेदन इस कार्यालय से संबंधित नहीं है—यानी भ्रष्टाचार की फाइलों को छिपाने का यह सबसे पुराना और भ्रष्ट हथकंडा है।


कानून का सबसे बड़ा सवाल: धारा 6(3) का पालन क्यों नहीं किया गया? सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि यदि संबंधित कार्यालय या जन सूचना अधिकारी के पास चाही गई जानकारी उपलब्ध नहीं थी या आवेदन उनके विभाग से संबंधित नहीं था, तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(3) का पालन समय रहते क्यों नहीं किया गया? नियम के अनुसार यदि कोई आवेदन किसी अन्य विभाग या कार्यालय से संबंधित होता है, तो उसे नियत समयावधि के भीतर संबंधित सक्षम विभाग को ट्रांसफर किया जाना अनिवार्य है। लेकिन ऐसा करने के बजाय, आवेदन को दबाए रखना और बाद में अपील के स्तर पर इसे खारिज कर देना सीधे तौर पर कानून की धज्जियां उड़ाने और आवेदक को गुमराह करने की सोची-समझी साजिश को उजागर करता है।



अपीलर्थी को पेश होने का गायब नोटिस का षड्यंत्र: आदेश पत्र में यह बेशर्म दावा किया गया है कि 19-06-2026 को पेशी थी और नोटिस भेजा गया था। सवाल यह उठता है कि यदि नोटिस भेजा गया था, तो वह कभी आवेदक तक क्यों नहीं पहुँचा? क्या यह कागजों पर ही सुनवाई दिखाने का कोई शातिर प्रशासनिक षड्यंत्र था?


डाक व्यवस्था पर नंगा सच: जब अपील खारिज होने का अंतिम आदेश रजिस्टर्ड डाक से सही सलामत और समय पर घर पहुँच सकता है, तो क्या सुनवाई का नोटिस डाक विभाग खा गया? साफ है कि आवेदक को जानबूझकर अंधेरे में रखा गया ताकि वे अपना पक्ष न रख सकें और फाइल दबी रह जाए।


साहब की एकतरफा तानाशाही: बिना किसी वैध नोटिस और सुनवाई के मनमाने तरीके से फाइल बंद कर देना, सीधे तौर पर तानाशाही और कानून के मुंह पर तमाचा है।


दागदार इतिहास और साहब की मेहरबानियों के किस्से:
अपर कलेक्टर सुनील नायक की कार्यशैली हमेशा से विवादों के केंद्र में रही है। शहर भूला नहीं है कि कैसे एक वर्ष पहले निजी अस्पताल ‘दयानिधि’ की जांच के लिए स्वयं के आदेश से बनाई गई टीम को महज 02 दिवस के भीतर स्वयं के ही आदेश को बदल दिया गया था। जिसमें यह आरोप लगा था की अस्पताल संचालक को बचाने और सच को दफनाने के लिए साहब ने अपने ही आदेश को पलटने में एक पल की भी देर नहीं लगाई थी।


इतना ही नहीं, सूत्रों से मिली जानकारी एवं प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि सरगुजा में ईमानदार छबि एवं नियम विरुद्ध कार्य करने वाले कलेक्टर अजीत वसंत को भी कथित तौर पर भ्रमित करलगभग 85 पटवारियों का तबादला तो बेरोक टोक किया गया परन्तु दूसरे लिस्ट में लगभग 35 पटवारियों के तबादला में बड़ा खेल किया गया। कमजोर एवं सीधे 85 पटवारियों को दूर-दराज भेजा गया एवं 35 पटवारियों की विशेष सूची निकाली गई, जिसमें अधिकांश रसूखदार और जमीन के अवैध कारोबार (दलाली) में लिप्त पटवारियों को शहर के इर्द-गिर्द मलाईदार हलकों में जमा दिया गया। भू-माफियाओं और जमीन दलालों को संरक्षण देने वाले इन पटवारियों पर अपर कलेक्टर का सीधा आशीर्वाद जगजाहिर है, जिसके एवज में साठगांठ के गंभीर आरोप लगातार उठते रहे हैं।


अब राज्य सूचना आयोग में खुलेगी पोल!:-  भ्रष्टाचार की परतों को छिपाने और आरटीआई एक्टिविस्टों को प्रताड़ित करने के इस गंदे खेल के खिलाफ अब पीड़ित आवेदक ने चुप बैठने से इंकार कर दिया है। आरटीआई कानून की धारा 19(3) के तहत राज्य सूचना आयोग में मजबूत द्वितीय अपील ठोकने की पूरी तैयारी कर ली गई है। अब देखना यह होगा कि आयोग के डंडे के आगे इन रसूखदार अधिकारियों का यह फर्जीवाड़ा कैसे टिकता है।

शासन के नए आदेश के पश्चात और क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए यह मांग तेजी से उठ रही है कि लगभग तीन वर्षों से सरगुजा में जमे अपर कलेक्टर सुनील नायक का तबादला प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए।


आए दिन यह आरोप लगते रहे हैं कि उद्योगपतियों के भूमि अधिग्रहण मामलों में ग्रामीणों के अधिकारों की अनदेखी करते हुए उन्हें दबाने या धमकाने का प्रयास किया जाता है। जनता और जागरूक नागरिकों का मानना है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर ऐसे अधिकारियों का स्थानांतरण हो, तो सरगुजा में पनप रहे भ्रष्टाचार और जमीन दलाली में संलिप्त पटवारियों व भू-माफियाओं पर प्रभावी लगाम लगाई जा सकेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *