सरगुजा समय सूरजपुर:
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर शहर में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे और निर्माण करने वालों के खिलाफ राजस्व न्यायालय ने अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाया है।
तहसीलदार न्यायालय ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 248 के तहत ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सूरजपुर स्थित खसरा नंबर 2630 की सरकारी सड़क की जमीन पर किए गए अवैध कब्जे को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
न्यायालय ने आदेश दिया है कि इस भूमि पर खड़े विशाल तीन मंजिला (ट्रिपल स्टोरी) भवन, कार्यालय, फैक्ट्री और बाउंड्रीवाल को तुरंत हटाया जाए और कब्जाधारी को इस जमीन से बेदखल किया जाए।
खसरा नंबर 2630 और पटवारी रिपोर्ट का बड़ा खुलासा
राजस्व दस्तावेजों के अनुसार, सूरजपुर का खसरा क्रमांक 2630 कुल 1.975 हेक्टेयर रकबे का है, जो आधिकारिक तौर पर शासकीय सड़क मद में दर्ज है। पटवारी हल्का क्रमांक-08 द्वारा पेश की गई जांच रिपोर्ट में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ था कि इस सार्वजनिक और महत्वपूर्ण सड़क की जमीन के लगभग 0.033 हेक्टेयर हिस्से पर दबंगई दिखाते हुए पक्का निर्माण कर लिया गया है।
इस जमीन पर न केवल व्यावसायिक गतिविधियां और फैक्ट्री चलाई जा रही थी, बल्कि आलीशान तीन मंजिला इमारत भी खड़ी कर दी गई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर राजस्व न्यायालय में बेदखली का आधिकारिक प्रकरण दर्ज किया गया।
न्यायालय में चली लंबी बहस और दोनों पक्षों के तर्क प्रकरण की सुनवाई के दौरान अदालत में दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली:
आपत्तिकर्ता का पक्ष: मामले के आपत्तिकर्ता कुंजबिहारी गुप्ता ने न्यायालय में पुख्ता दस्तावेज रखते हुए कहा कि सरकारी जमीन पर अनावेदक द्वारा अवैध निर्माण कर बड़े पैमाने पर फैक्ट्री का संचालन किया जा रहा है, जिस पर तत्काल कानूनी कार्रवाई होना अनिवार्य है। इस दौरान छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के रिट क्रमांक 866/2026 (डी.के. सोनी एवं अन्य बनाम शासन) के उस महत्वपूर्ण आदेश का भी हवाला दिया गया, जिसमें शासकीय और सार्वजनिक भूमि के संरक्षण के कड़े निर्देश दिए गए हैं।
अनावेदक का पक्ष: दूसरी ओर, आरोपी कब्जाधारी रितेश अग्रवाल (पुत्र सुरेश अग्रवाल) ने अपना बचाव करते हुए पटवारी और राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट को पूरी तरह पक्षपातपूर्ण और तथ्यों से परे बताया। उनका तर्क था कि उनके खिलाफ तैयार किया गया पंचनामा उनकी अनुपस्थिति में बनाया गया था और पुराने राजस्व नक्शों का सही परीक्षण किए बिना उन्हें दोषी ठहराया जा रहा है। उन्होंने मामले में फिर से सीमांकन और संयुक्त स्थल निरीक्षण कराने की मांग की थी।
न्यायालय का कड़ा फैसला: साबित हुआ अवैध कब्जा, सभी पक्षों की दलीलों, राजस्व अभिलेखों, नक्शों और पटवारी की विस्तृत रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, तहसीलदार न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार के निजी निर्माण का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह स्पष्ट रूप से शासकीय सड़क के रूप में दर्ज है।
न्यायालय ने माना कि इस सार्वजनिक भूमि पर पक्का निर्माण कर कब्जा किया जाना पूरी तरह से प्रमाणित हो चुका है।
महत्वपूर्ण निर्देश और आगामी प्रशासनिक कार्रवाई न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया है कि अनावेदक रितेश अग्रवाल तीन दिवस के भीतर स्वयं इस अवैध अतिक्रमण को हटाएं और न्यायालय के समक्ष अपना अनुपालन प्रतिवेदन (पालन रिपोर्ट) पेश करें।
यदि निर्धारित तीन दिन की समयावधि के भीतर अतिक्रमण नहीं हटाया गया, तो जिला प्रशासन और राजस्व विभाग का अमला बलपूर्वक इस अवैध निर्माण को जमींदोज करते हुए बेदखली की बड़ी कार्रवाई को अंजाम देगा। इस कड़े फैसले के बाद सूरजपुर शहर के भू-माफियाओं और अवैध कब्जाधारियों में हड़कंप मच गया है।

