सरगुजा समय अंबिकापुर:– सरगुजा में तमाम प्रकार के बड़े बड़े पर्व-त्योहारों आयोजनों से पहले होने
सरगुजा समय अंबिकापुर:– सरगुजा में तमाम प्रकार के बड़े बड़े पर्व-त्योहारों आयोजनों से पहले होने वाली शांति समिति की बैठकें अब जनहित का मंच नहीं, बल्कि ‘चार खास चेहरों’ का फोटो सेशन कार्यक्रम बनकर रह गई है।
अब जिले की कानून-व्यवस्था, दुर्गा पूजा, ताजिया, ईद, रामनवमी, होली-दिवाली, क्रिसमस, जैसे संवेदनशील आयोजनों पर फैसले लेने का अधिकार मानो कुछ गिने-चुने लोगों को आजीवन पट्टे पर दे दिया गया है। अब ऐसा प्रतीत होता दिख रहा है।
सवाल सीधा और चुभने वाला है—क्या पूरा सरगुजा जिला सिर्फ इन चार चेहरों में ही सिमट कर रह गया है? वर्षो से शांति समिति के बैठक के पीछे सिर्फ चाय-समोसा, औपचारिकता और वही घिसे-पिटे चेहरे के साथ वही सवाल वही निजात एवं वही आदेश तक यह बैठक सिमित हो गई है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें की जिले में कोई भी बड़ा त्योहार आता है तो कलेक्ट्रेट और पुलिस कंट्रोल रूम की कुर्सियां सजती तो हैं, पर अंदर का नजारा दशकों से बदलता नहीं दिखा :- शहर में जिस अमन चैन एवं शांति भरे आयोजन होने के लिए यह बैठक बुलाई जाती है उस शांति समिति की बैठक बुलाई जाती है उस बैठक में वर्षो से ‘परमानेंट सदस्यों’ का कब्जा जमा हुआ है ऐसा शहर में चर्चा बना हुआ है वर्षो से वही घिसे पिटे चेहरे वही, तकरीरें वही, और फैसले भी वही।
मिली जानकारी के अनुसार इस शांति समिति में ऐसे भी सदस्य है जिनका बात उनके पड़ोसी भी नहीं सुनते है और जिनका अपने वार्ड तक में कोई जमीनी संपर्क नहीं बचा, है लेकिन प्रशासनिक बैठकों में वे पूरे जिले के ‘सर्वमान्य ठेकेदार’ बनकर अगली कतार में बैठते हैं।
ग्राउंड जीरो की समस्याओं से आंखें मूंदे: नए पूजा पंडालों की दिक्कतें, गली-मोहल्लों में बिजली-पानी और ट्रैफिक की मार, विसर्जन रूट के गड्ढे और स्थानीय युवाओं का असमंजस—ये असल मुद्दे इन बैठकों में कभी उठते ही नहीं, क्योंकि मठाधीशों को धरातल की हकीकत से कोई वास्ता ही नहीं।
विपक्षी और नए दलों का पत्ता साफ: अलग-अलग सामाजिक गुटों, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और कर्मठ युवा संगठनों को बैठक की दहलीज तक फटकने नहीं दिया जाता।
कलेक्टर-एसपी साहब! क्या बाकी सरगुजावासी सिर्फ आदेश बजाने के लिए हैं? शहर के प्रबुद्ध नागरिकों, युवा मंडलों और सामाजिक संगठनों में अब यह गुस्सा खौल रहा है। जनता साफ पूछ रही है कि जब त्योहार सबका है, पुलिस और प्रशासन की पाबंदियां हर नागरिक पर लागू होती हैं, तो फैसले लेने का एकाधिकार सिर्फ एक बंद कमरे के चार चेहरों के पास क्यों?
शहर के आम नागरिकों की मुख्य मांग अब उठाने लगी है की जिले में तत्काल शांति समिति का पुनर्गठन होना चाहिए :- आम नागरिकों का मुख्य मांग है की अब यह मामला सिर्फ सुधार की नहीं, बल्कि इस अलोकतांत्रिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की है, दशकों पुरानी और बासी हो चुकी शांति समिति की सूची को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर सभी 48 वार्डों, व्यापारिक संगठनों, विभिन्न समाजों के सक्रिय प्रभारियों और नई पीढ़ी के आयोजकों को सीधी जगह मिले।
जिस हिसाब से वर्षो से शांति समिति सूची में मठाधीश बने हुए लोगों के आजीवन सदस्यता का तमाशा चल रहा है उसे बंद कर रोटेशन व्यवस्था लागू हो, ताकि हर वर्ग की आवाज प्रशासनिक मंच तक पहुंचे। और दशकों से चल रहे इस मनमानी को खत्म कर शांति समिति का तत्काल विस्तार किया जाना चाहिए।
जिससे आम नागरिकों एवं विभिन्न दलों के लोगों सामाजिक एवं प्रतिष्ठित नागरिकों कों जिले की शांति समिति बैठक में शामिल किया जाए जिससे बात बात पर अपनी समस्या कों सुलझाने के लिए सड़कों पर धरना प्रदर्शन के जगह अपनी बात सामाजिक लोगों के माध्यम से जिला प्रशासन के समक्ष रख कर होने वाली समस्या का हल निकाला जा सके।
