09/07/2026
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सरगुजा समय अंबिकापुर (सरगुजा)। एक बार फिर आयुष्मान भारत योजना के नाम पर मरीजों से लूट का मामला सामने आया है। ‘दयानिधि हॉस्पिटल’ और उसके संचालक डॉ. संदीप त्रिपाठी पर इलाज के दौरान फोन-पे (PhonePe) और कैश के जरिए अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगे हैं। हालांकि, विभाग ने खानापूर्ति के लिए जांच के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन इस बार सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह आदेश भी पुरानी फाइलों की तरह रद्दी की टोकरी में जाएगा?

सयुंक्त संचालक डॉक्टर अनिल शुक्ला के द्वारा जारी पत्र एवं पिछली जांचें बनीं ‘कागजी खानापूर्ति’

हैरानी की बात यह है कि दयानिधि हॉस्पिटल का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड बेहद संदिग्ध रहा है। पूर्व में भी संयुक्त संचालक (JD) के द्वारा कार्रवाई के लिए भेजे गए पत्रों को CMHO कार्यालय द्वारा ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। ऐसा लगता है जैसे JD के निर्देश CMHO के लिए कोई मायने नहीं रखते और अस्पताल प्रबंधन पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें विभाग का ‘अघोषित संरक्षण’ प्राप्त है। क्या CMHO का कार्यालय इस अस्पताल के खिलाफ की गई पिछली शिकायतों को ‘कूड़ा’ समझकर अनदेखा करता रहा है?

अस्पताल प्रबंधन एवं अस्पताल के स्टॉफ के बैंक खातों में दफन है ‘लूट’ का सच
इस बार मांग सिर्फ जांच की नहीं, बल्कि ‘गहन वित्तीय ऑडिट’ की है। सूत्रों का कहना है कि अगर अस्पताल प्रबंधन और वहां तैनात स्टाफ के बैंक खातों की निष्पक्ष जांच हो, तो करोड़ों की अवैध कमाई का काला सच सामने आ जाएगा।

फोन-पे (PhonePe) का जाल: अस्पताल का वह अकाउंट और उन कर्मचारियों के निजी खाते खंगाले जाएं, जिनमें मरीजों से अवैध रूप से पैसे ट्रांसफर कराए गए।

दस्तावेजों का मिलान: आयुष्मान योजना के पोर्टल पर दर्ज डेटा और अस्पताल के निजी रिकॉर्ड का मिलान होते ही दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।

दयानिधि अस्पताल के लगातार बचाव के मामले में अब प्रशासन की साख दांव पर
अगर इस बार भी जांच के नाम पर लीपापोती हुई, तो यह साबित हो जाएगा कि अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के बीच एक मजबूत ‘सांठगांठ’ है। जिले के जागरूक नागरिक अब यह पूछ रहे हैं कि—क्या प्रशासन का डर सिर्फ गरीब मरीजों के लिए है, या रसूखदार अस्पतालों पर भी कानून का डंडा चलेगा?

9 बेड वाला अस्पताल महज 3 साल में 6 करोड़ का भुगतान मामले में अस्पताल पर जाँच की आंच क्यों नहीं :- ‘दयानिधि हॉस्पिटल’ के काले कारनामों की परतें अब एक-एक कर उधड़ने लगी हैं। आयुष्मान भारत योजना के नाम पर मरीजों से अवैध वसूली का आरोप झेल रहे इस अस्पताल का एक और चौंकाने वाला सच सामने आया है। महज 9 बेड की क्षमता वाला यह अस्पताल 3 वर्षों के भीतर आयुष्मान योजना के माध्यम से लगभग 6 करोड़ रुपये का भुगतान डकार चुका है। यह आंकड़ा न केवल संदिग्ध है, बल्कि बड़े वित्तीय घोटाले की गवाही दे रहा है।

दयानिधि अस्पताल एवं संचालक के द्वारा फर्जी आंकड़ों का खेल: सवालों के घेरे में अस्पताल की क्षमता चिकित्सा विशेषज्ञों और आम लोगों के लिए यह समझ से परे है कि मात्र 9 बेड वाला एक छोटा सा अस्पताल 3 साल में 6 करोड़ रुपये का सरकारी भुगतान कैसे प्राप्त कर सकता है? क्या मरीजों की संख्या और इलाज के दावों को फर्जी तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था?

स्थानीय जांच की औकात से बाहर है यह मामला, अब ACB-SIT का दखल जरूरी पूर्व में CMHO कार्यालय द्वारा की गई जांचों के ‘परिणामहीन’ रहने और जेडी (JD) के पत्रों को ‘कूड़ा’ समझने की परिपाटी ने यह साबित कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर इस मामले की निष्पक्ष जांच संभव नहीं है।


मिलीभगत की आशंका: करोड़ों के इस खेल में विभाग के भीतर से किसी बड़े ‘संरक्षण’ की बू आ रही है।


ACB-SIT ही एकमात्र रास्ता: चूंकि यह मामला सरकारी धन की सीधी लूट (Embezzlement) का है, इसलिए अब राज्य स्तर की ACB (Anti-Corruption Bureau) या SIT (Special Investigation Team) द्वारा ही इसकी जांच होनी चाहिए, ताकि अस्पताल प्रबंधन के साथ-साथ इस भ्रष्टाचार में लिप्त विभागीय अधिकारियों की गर्दन भी कानून के शिकंजे में आए।

वर्षो तक बिना लिफ्ट के हॉस्पिटल का संचालन लगातार खबर प्रकाशन के बाद लिफ्ट तो लगवाया गया लेकिन रैम्प की व्यवस्था अभी भी नहीं आगजनी की घटना में लखनऊ से बड़ा हादसा होने का भय जवाबदार कागजों में ही फायर सेफ्टी की बात करते नजर आते हैं धरातल में नियमों की धज्जियाँ कैसे उड़ाना हैं कोई दयानिधि अस्पताल एवं डॉक्टर संदीप त्रिपाठी से सीखे।

अब देखना यह है कि क्या इस बार स्वास्थ्य विभाग अपनी साख बचा पाएगा, या एक बार फिर दयानिधि हॉस्पिटल विभागीय ‘आशीर्वाद’ के दम पर जांच के घेरे से बाहर निकल जाएगा?

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