29/06/2026
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सरगुजा समय अंबिकापुर:- चिकित्सा के क्षेत्र को सेवा का माध्यम माना जाता है, लेकिन अंबिकापुर स्थित ‘दयानिधि निजी अस्पताल’ एवं शासकीय डॉक्टर संदीप त्रिपाठी पर लगे गंभीर आरोपों ने इस पेशे की गरिमा को तार-तार कर दिया है। स्थानीय लोगों और भुक्तभोगी मरीजों का आरोप है कि यह अस्पताल स्वास्थ्य सेवा केंद्र कम, ‘अवैध उगाही का अड्डा’ अधिक बन गया है।


दयानिधि निजी अस्पताल के दलालों द्वारा मरीजों को आयुष्मान का लालच, दे ईलाज के नाम पर कर रहे खुली लूट..

सोशल मिडिया में एक व्यक्ति ने वीडियों साझा करते हुए आरोप लगाया कि दयानिधि अस्पताल का पूरा तंत्र एक सोची-समझी रणनीति के तहत काम कर रहा है। अस्पताल प्रशासन पर आरोप है कि यहाँ मरीज के आते ही ‘आयुष्मान कार्ड’ का उपयोग कर सरकार से मोटी रकम की निकासी तो की ही जाती है, साथ ही साथ मरीज के परिजनों एवं मरीजों से अलग से फोन पे एवं कैश रुपये वसूले जा रहे हैं लेकिन शासकीय डॉक्टर संदीप त्रिपाठी एवं उनके स्वघोषित स्वामित्व वाले दयानिधि अस्पताल पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही हैं।

मरीजों से कैश एवं फोन पे से पैसे लेने का अस्पताल के स्टॉफ के पास अवैध वसूली का गजब का ‘हुनर’ देखने को मिल रहा हैं?

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अस्पताल प्रबंधन ने मरीजों एवं उनके परिजनों से अवैध वसूली का एक ‘अजीबोगरीब हुनर’ निकाल डाला हैं लिया है। आयुष्मान योजना से ईलाज करने एवं उसके बाद मरीजों से ली जाने वाली मोटी रकम अक्सर सीधे अस्पताल के खाते में न लेकर, अस्पताल के विभिन्न ‘स्टॉफ सदस्यों’ के नाम पर लिए जाने की बात सामने आ रही है। यह तरीका तकनीकी रूप से यह दिखाने के लिए है कि अस्पताल का इसमें कोई लेना-देना नहीं है, जबकि हकीकत में यह हैं की डॉक्टर संदीप त्रिपाठी संगठित गिरोह की तरह काम कर रहा है।


दिमागी खेल में उस्ताद डॉक्टर त्रिपाठी अपने स्टॉफ तक को नहीं छोड़ रहे अपने ‘दलाली’ वाली मंशा में अपने स्टॉफ को जेल भेजवाने की तैयारी कर रहे हैं?

जिस हिसाब से शासकीय डॉक्टर संदीप त्रिपाठी एवं स्वघोषित स्वामित्व वाले दयानिधि निजी अस्पताल में मरीजों को गाँव गाँव से दलालों के माध्यम से ला कर भरा जा रहा हैं एवं आयुष्मान योजना से शासन को करोड़ों कई करोड़ रूपए का चपत लगाया जा रहा हैं उस हिसाब से इनके निजी अस्पताल का माहौल किसी ‘मछली बाजार’ से कम नहीं है, जहाँ सेवा के बजाय केवल ‘कमीशन’, मरीजों का दोहन और ‘वसूली’ पर ध्यान केंद्रित रहता है, ना की मरीजों के ईलाज पर

आपकी जानकारी के लिए बता दे की सरगुजा समय द्वारा लगातार खबर के माध्यम से बताया जाता रहा हैं की कैसे एक नियमविरुद्ध तरीके से निजी अस्पताल का संचालक एक तत्कालीन नर्सिंग होम एक्ट के प्रभारी द्वारा अपनी धर्मपत्नी के नाम से खोला जाता हैं एवं सुरुवाती दौर में यह अस्पताल महज 09 बेड का होता हैं जिसमें मात्र 09 बेड के अस्पताल में सिर्फ तीन वर्षो में ही लगभग छः करोड़ रूपए का आयुष्मान योजना के तहत शासन से पैसा अवैध रूप से प्राप्त कर लिया जाता हैं। उसके बाद अपने पद का दुरूपयोग करते हुए स्वयं कागजी कार्यवाही नियमविरुद्ध तरीके से बढाते हुए इस अस्पताल में 11 बेड की संख्या बढ़ा दी जाती हैं जिसके बाद अब इस दयानिधि अस्पताल में बेड़ो की संख्या 20 हो गई हैं जिसके बाद अब बड़े पैमाने में और करोड़ों से बढ़कर अरबों रूपए का शासन को चपत लगाने की तैयारी हैं

विशेष सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कागजों में इस निजी अस्पताल में एक ISU भी हैं जबकि हॉस्पिटल में ISU महज खाना पूर्ति वाली स्थिति में हैं, अब सभी बेड की संख्या जोड़ लिया जाए तो दयानिधि निजी अस्पताल में टोटल बेड़ो की संख्या 21 हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात यह हैं की जिस अस्पताल के सामने टोटल 21 दो पहिया वाहन नहीं खड़े हो सकते जहाँ ग्राउंड फ्लोर एवं फस्ट फ्लोर में बाथरूम छोड़ कोई जगह नहीं बचा हर जगह बेड एवं मरीज के साथ उनके परिजनों का जमावड़ा लगा रहता हैं, वहां अगर कोई बड़ी घटना घट जाती हैं तो जवाबदारी किसकी होंगी?

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार आपको बता दे की उक्त निजी अस्पताल में रैम्प की कोई सुविधा नहीं हैं सरगुजा समय के बार बार खबर प्रकाशन के बाद अस्पताल के प्रबंधक द्वारा लिफ्ट तो लगवा लिया गया हैं परन्तु आज भी रैम्प को व्यस्था इस अस्पताल में नहीं हैं, जिससे अगर कभी आगजनी की घटना घट जाती हैं तो मरीजों एवं उनके परिजनों को दहकती आग में जलभून कर अपना जान देना पड़ेगा या फिर अस्पताल की बिल्डिंग से खुद कर क्योंकि आगजनी की स्थिति में लिफ्ट तो बंद हो जायेगा और प्रथम तल से निचे उतरने का कोई साधन नहीं रहेगा।

अत्यंत विशेष सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार डॉक्टर संदीप त्रिपाठी शासकीय अस्पताल से अपने दायित्व से मुँह मोड़ते हुए छुट्टी का आवेदन देकर स्वघोषित अपना निजी अस्पताल चला रहे हैं एवं स्वयं के कई करोड़ की लागत से बनने वाले नवनिर्माण अस्पताल की देखरेख बड़े आराम से कर रहे हैं एवं बतौर इंजिनियर ठेकेदार का फ़र्ज निभा रहे हैं।


सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह ‘अवैध उगाही का अड्डा’ बिना किसी डर के चल रहा है?


आयुष्मान का दुरुपयोग: क्या प्रशासन ने कभी इस बात की ऑडिट की है कि जो सर्जरी या उपचार कार्ड पर दिखाए गए, क्या वे वास्तव में हुए भी थे या सिर्फ कागजों में ही हुए?


अवैध वसूली की जांच: स्टॉफ के नाम पर ली गई लाखों की राशि का स्रोत और उसके गंतव्य की जांच क्यों नहीं हो रही?


यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य विभाग के लिए एक चुनौती है, बल्कि आम जनता के साथ किया गया एक क्रूर मज़ाक भी है। अब वक्त आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी इस ‘मछली बाजार’ पर छापा मारें और उन सभी चेहरों को बेनकाब करें, जो वर्दी और डॉक्टरी के सफेद कोट की आड़ में आम लोगों का खून चूस रहे हैं।

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