सर्कस या अस्पताल? अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज में सुरक्षा तार-तार, बेरोकटोक एंट्री से मंडराया बड़ा खतरा!
इलाज के नाम पर वार्डों में सज रहा ‘मेला’, डॉक्टरों पर बढ़ा तनाव; नागरिकों ने पूछा— ‘प्रबंधन किसी बड़ी अनहोनी का कर रहा इंतजार..
सरगुजा समय अंबिकापुर।
सरगुजा संभाग का सबसे बड़ा लाइफलाइन अस्पताल, यानी राजमाता श्रीमती देवेंद्र कुमारी सिंहदेव मेडिकल कॉलेज अस्पताल, इन दिनों खुद ‘इलाज’ की बाट जोह रहा है। अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था इस कदर वेंटिलेटर पर है कि यहाँ गंभीर मरीजों से ज्यादा आवारा घूमते लोग और तमाशबीन नजर आते हैं। चारों तरफ से खुले रास्ते और सुरक्षा के नाम पर खानापूर्ति ने इस अति-संवेदनशील परिसर को एक खुला मैदान बना दिया है। इस गंभीर लापरवाही को लेकर अब शहर के सजग नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा है और उन्होंने प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अस्पताल को ‘सुरक्षा के अभेद्य किले’ में बदलने की मांग की है।
इन आवारा एवं अन्य निजी अस्पतालों के दलालों के बेरोक टोक मरीज के बेड तक पहुंचने से वार्डों में मरीज बेहाल, डॉक्टर परेशान! वाली स्थिति लगातार निर्मित होती रहती हैं।
आपको बता दे की अस्पताल का नियम कहता है कि मरीज को शांति मिलनी चाहिए, लेकिन अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज के वार्डों का नजारा किसी सब्जी मंडी से कम नहीं है। कई चोर-रास्ते और खुले गेट होने की वजह से असामाजिक तत्व, दलाल और बिना काम के लोग सीधे मरीजों के बेड तक धड़धड़ाते हुए घुस रहे हैं।
इस अनियंत्रित भीड़ के कारण गंभीर मरीजों का दम घुट रहा है और संक्रमण (Infection) का खतरा सौ गुना बढ़ गया है। सबसे बड़ा संकट डॉक्टरों और महिला नर्सिंग स्टाफ पर है, जो हर वक्त डर के साए में काम करने को मजबूर हैं।
नागरिकों ने साफ कहा है कि अगर समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी, तो यहाँ कभी भी कोलकाता या अन्य बड़े अस्पतालों जैसी अप्रिय घटना घट सकती है। हाल ही मे मेडिकल कॉलेज अस्पताल से भी एक व्यक्ति के द्वारा दवा चोरी कर भागने का मामला सामने आया था बावजूद उसके प्रबंधन द्वारा सुरक्षा को लेकर बड़ी लापरवाही बरती जा रही हैं।
शहर मे हो रही चर्चा के अनुसार जनता अस्पताल प्रबंधन को अल्टीमेटम भी देने के मूड मे हैं जिसमे उनकी प्रमुख्य मांग होंगी उसके पूरा नहीं करने मे आंदोलन की तैयारी भी पुरे जोरदार तरीके से हैं।
ये दो नियम लागू करो, वरना मचेगा बवाल
शहर के प्रबुद्ध जनों और मरीजों के शुभचिंतकों ने अस्पताल प्रशासन को घेरते हुए दो टूक शब्दों में ‘सुरक्षा चक्र’ लागू करने की मांग की है आम नागरिकों ने चर्चा के दौरान दो नियम बताया की जिसे पूरा करने से अस्पताल की सुरक्षा सही हो सकती हैं।
पहला सुझाव एक गेट… कड़ा पहरा: अस्पताल के तमाम फालतू और पिछले गेटों को तुरंत सील किया जाए। पूरे अस्पताल के लिए केवल एक ही मुख्य द्वार (Single Entry Gate) चालू रखा जाए, जहाँ सुरक्षाकर्मी हर आने-जाने वाले की कुंडली खंगालने के बाद ही उसे अंदर जाने दें।
दूसरा सुझाव अटेंडेंट पास सिस्टम (बिना पास, सीधे बाहर): अस्पताल को धर्मशाला समझना बंद करना होगा। हर मरीज के साथ केवल एक स्थायी अटेंडेंट को रहने की अनुमति मिले, जिसे बकायदा फोटोयुक्त ‘कलर-कोडेड पास’ जारी हो। सुरक्षा गार्ड हर वार्ड के गेट पर तैनात हों और बिना पास वाले हुड़दंगियों को सीधे धक्का मारकर बाहर का रास्ता दिखाएं।
प्रशासन की नींद कब खुलेगी?
सवाल यह उठता है कि करोड़ों रुपए के बजट के बावजूद अस्पताल प्रबंधन इस कदर आंखें मूंदे क्यों बैठा है? क्या प्रबंधन को किसी बड़े हादसे या डॉक्टरों की हड़ताल का इंतजार है?
स्थानीय नागरिकों ने सरगुजा समय से चर्चा के दौरान मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन को सीधे चेतावनी दी है कि यह सिर्फ एक सुझाव नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा से जुड़ा सीधा सवाल है।
अब गेंद अस्पताल अधीक्षक और जिला प्रशासन के पाले में है—या तो वे ‘पास सिस्टम’ और ‘सिंगल गेट’ लागू करके अपनी संवेदनशीलता दिखाएं, या फिर किसी बड़ी अनहोनी की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार रहें।

