सरगुजा समय अंबिकापुर: क्या छत्तीसगढ़ के कृषि विभाग में कानून की किताब अब केवल दिखावे की वस्तु रह गई है? सरगुजा कृषि विभाग से जो खबरें छनकर आ रही हैं, वे किसी प्रशासनिक अराजकता से कम नहीं हैं।
महिला आयोग के स्पष्ट आदेशों को उप संचालक क़ृषि पी एस दीवान के द्वारा सरेआम ठेंगा दिखाया जाना, राज्य के प्रशासनिक ढांचे की उस सड़न को उजागर कर रहा है, जहाँ ‘भ्रष्टाचार’ को संरक्षण देना ही ‘कर्तव्य’ बन गया है। जब स्वयं उप संचालक के ऊपर कोरिया जिले में रहते हुए लगभग 90 लाख रूपए के भ्रस्टाचार का आरोप लग चूका हो वह भ्रष्ट अफसर के द्वारा एक भ्रष्ट अधिकारी को बचाना लाजमी ही हैं।
भ्रस्ट अफसर को बचाने उप संचालक ने महिला आयोग के आदेश को रद्दी का टुकड़ा बना डाला.. मामला महिला सुरक्षा और प्रशासनिक कदाचार से जुड़ा है। महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक ने जनसुनवाई के दौरान आरोपी अधिकारी विनायक पांडेय की करतूतों पर संज्ञान लेते हुए उनके तत्काल निलंबन (Suspension) और दो वेतन वृद्धि रोकने का निर्देश दिया था। लेकिन, सरगुजा कृषि विभाग के उप संचालक पीतांबर सिंह दीवान ने इस संवैधानिक संस्था के आदेश को अपने पैरों तले रौंद दिया। दीवान साहब का यह आचरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उनके लिए सरकारी नियम और आयोग के आदेश महज कागजी औपचारिकताएं हैं।
कार्यालय वरिष्ठ क़ृषि विकास अधिकारी लखनपुर के समस्त स्टॉफ एक साथ प्रभारी सयुंक्त संचालक सरगुजा पीताम्बर सिंह दीवान से मिल कर महिला आयोग के दिए निर्देश पर कार्यवाही करते हुए विनायक पाण्डेय को निलंबित करने का पूरा जोर लगा लिए लेकिन दीवान साहब अपने ही विभाग के स्टॉफ से दिन भर मुँह छुपाते दिखे बड़ी मान मनुवल के बाद लखनपुर क़ृषि विभाग के समस्त स्टॉफ से मिल उनका ज्ञापन ग्रहण किया और विनायक पाण्डेय को निलंबित करने के जगह बिना पद वाले स्थान में तबादला कर अपने स्टॉफ के साथ बेईमानी एवं भ्रस्ट अधिकारी विनायक पाण्डेय से ईमानदारी दिखाए हैं।
क़ृषि विकास अधिकारी विनायक पाण्डेय को ‘निलंबन’ की जगह ‘वीआईपी पोस्टिंग’ उप संचालक का खेल…
हैरत की बात यह है कि जिस प्रभारी अधिकारी विनायक पाण्डेय को सस्पेंड करना चाहिए था, उसे ‘उपहार’ स्वरूप कार्यालय वरिष्ठ क़ृषि विकास अधिकारी लखनपुर से कार्यालय अनुविभागीय क़ृषि अधिकारी अंबिकापुर में सलग्न कर दिया। सूत्रों की मानें तो जिस कार्यालय में इनको सलग्न किया गया है, वहाँ उस पद की कोई संरचना ही नहीं है। यह बिना पद के ‘वीआईपी पोस्टिंग’ का खेल किसी सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करता है, जिसका मकसद विनायक पांडेय को पदोन्नति की दौड़ में शामिल रखना और भ्रष्टाचार के दाग को मिटाना माना जा सकता है।
क्या पीताम्बर सिंह दीवान एवं विनायक पाण्डेय की ‘जुगलबंदी’ के पीछे है कोई ‘बड़ा चेहरा’? प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। की पूर्व में रिश्वतखोरी के वायरल वीडियों के पश्चात् विनायक पाण्डेय के निलंबन की कार्यवाही की गई थी जिसके बाद अब क़ृषि विभाग के डायरेक्टेट में किसी अधिकारी ने उक्त रिश्वतखोरी के मामले में दोषमुक्त करवाने एवं पदोन्नति की रहा आसान करवाने का आश्वाशन दिया गया हैं जिसके कारण रिश्वतखोरी एवं विभागीय महिलाओं से अभद्र व्यवहार करने वाले विनायक पाण्डेय के पर सातवें आसमान में लहरा रहे हैं।
सबसे ज्वलंत मुद्धा एवं बड़ा सवाल :- आखिर क्या कारण है कि उप संचालक पीतांबर सिंह दीवान एक दागदार अधिकारी को बचाने के लिए खुद की नौकरी भी दांव पर लगा रहे हैं?
क्या विनायक पांडेय की अवैध कमाई का हिस्सा ऊपर तक पहुँच रहा है?
क्या दीवान साहब की ऐसी कोई ‘सीक्रेट फाइल’ या मामला विनायक पाण्डेय के पास है, जिसके डर से वे उनके इशारों पर नाच रहे हैं?
या फिर, यह पूरे तंत्र की उस मिलीभगत का हिस्सा है, जहाँ भ्रष्ट अधिकारी आपस में एक-दूसरे की ढाल बनते हैं?
विनायक पाण्डेय के ऊपर उप संचालक क़ृषि के आशीर्वाद एवं बचाव को लेकर विभागीय एवं जन आक्रोश और न्याय की पुकार काफी तेज हो गई हैं।
जहाँ एक ओर राज्य सरकार का दावा है कि वह महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय पर ‘जीरो टॉलरेंस’ अपनाती है, वही सरगुजा का कृषि विभाग इस दावे का उपहास उड़ा रहा है।
यह मामला सिर्फ एक अधिकारी के निलंबन का नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का है जो जनता का तंत्र पर होता है। यदि महिला आयोग के आदेशों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती, तो आम आदमी का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठना लाजिमी है।
अब सवाल यह है: क्या कृषि विभाग के आला अफसर इस ‘अंधेरगर्दी’ पर चुप रहेंगे, या फिर इस ‘प्रशासनिक मनमानी’ की जड़ तक पहुँचकर दोषियों को बेनकाब करेंगे? प्रदेश की निगाहें अब शासन के उस रुख पर टिकी हैं, जो बताएगा कि क्या वाकई कानून सबके लिए बराबर है।
जिस हिसाब से पीताम्बर सिंह दीवान विनायक पाण्डेय को निलंबित करने से बच रहे हैं और एक भ्रष्ट अफसर को बचाने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं उससे यह माना जा सकता हैं की उप संचालक महोदय स्वयं के रिटायर्मेंट से पहले विनायक पाण्डेय को निलंबन से बचाने के चक्कर में स्वयं निलंबित होने की राह आसान कर रहे हैं यह माना जा सकता हैं।

