छत्तीसगढ़

गंदे पानी से बुझती है इस गांव के लोगों की प्यास, झिरी के सहारे ग्रामीण..आखिर जिम्मेदार बेखब़र क्यो?

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पेटलावद |  शासन -प्रशासन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रो मे लाखो- करोड़ो रूपये खर्च कर ग्रामीणो को मूलभूत सुविधाएं देने का दावा कर रहा है। किन्तु पश्चिमी मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले मे हालात बेहद खराब हैं। जमीनी स्तर की बात कि जाए तो शासन की योजनाएं और दावे फेल होते नजर आ रहे हैै। जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से बेखबर नजर आ रहे है। नेता सिर्फ वोट के लिए राजनिति कर रहे है। लेकीन जनता आज भी मूलभूत सुविधाओ के लिए जद्दोजहद कर रही है।

झाबुआ जिले की पेटलावद तहसील से सामने आया है। जहां ग्रामीण पेयजल के लिए संघर्ष करते दिखाई दिए। पेटलावद जनपद पंचायत क्षेत्र अन्तर्गत आने वाली ग्राम पंचायत भील कोटड़ा मे इन दिनो हालात यह है की लोग गंदा पानी पीने को मजबूर है। गांव के लोग झिरी के सहारे अपनी प्यास बुझा रहे है। भील कोटड़ा पंचायत के ग्राम नरसिंहपुरा के दो फलिया ऐसे हैे जिनमे करीब 700 लोग निवास करते है। किन्तु इन ग्रामीणो की प्यास बुझाई जा सके ऐसा गांव मे कोई जल स्त्रोत नही है।

जिस वजह से लगभग ढेड किमी दूर माही नदी मे उबड खाबड मार्ग का खतरो भरा सफर तय कर ग्रामीण झिरी तक पंहुचते है। और फिर जाकर कही उन्हे पानी नसीब होता है। लेकीन विडबना है कि ग्रामीणो को फिर भी स्वच्छ पानी नही मिल पाता है। झिरी से निकलने वाले गंदे पानी को ही ग्रामीण पी रहे है। जिससे ग्रामीण बिमारीयो का शिकार भी हो रहे है। सुबह से ही महिलाएं एकत्रित होकर झिरी के समीप पंहुच जाती है।

ओर घंटो इंतजार के बाद उन्हे पानी मिल पाता है। शासन प्रशासन की और यहां पानी को लेकर कोई व्यवस्थाएं नही है। पीईएचई विभाग द्वारा जो पूर्व मे हेडपंप लगाए गये थे उनमे से अधिकतर खराब पडे। और एक हेडपंप चल रहा है जो भी मुश्किल से एक बाल्टी पानी भी नही दे पा रहा है।

ग्रामीणो के अनुसार ग्राम पंचायत या प्रशासन की और से भी पेयजल को लेकर कोई व्यवस्थाएं नही की गई है। कई सालो से ग्रामीण इसी तरह पानी के लिए सघर्ष कर रहे है। लेकीन इनकी सुनने वाला कोई नही है। चुनाव आते है तो गांव मे नेताओ का आना जाना होता है लेकीन चुनाव होते ही ग्रामीणो की कोई पुछ परख करने वाला नही है। ऐसे मे ग्रामीण बेहद परेशान हो चुके है। शासन प्रशासन के सारे दावे यहां खोखले साबित हो रहे है।

इंसान तो ठीक मवेशियो को भी पानी नसीब नही हो पाता है। एक गांव के ही व्यक्ति के द्वारा मेवेशियो के लिए पानी की व्यवस्था की जाती है। अन्यथा मवेशी प्यासे ही रह जाए। अब देखना होगा की शासन प्रशासन के जिम्मेदार कब तक इन ग्रामीणो के पास पंहुचते है या फिर इसी तरह ग्रामीण अपना जीवन यापन करेगे।

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