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Sunday, October 17, 2021
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देश के दामन पर दाग हैं दिल्ली के दंगाई, अब दिल्ली के दरिंदे दंगाइयों को सख्ती से कुचलना ही होगा

कृष्ण कुमार द्विवेदी (राजू भैया)
*बस* ! बहुत हो चुका? अब दिल्ली के दरिंदे दंगाइयों को सख्ती से कुचलना ही होगा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के समय बेशर्म सियासत की गोद में पले दंगाइयों ने जो किया उनका कृत्य देश की अस्मिता पर कलंक बन गया! घरों व कार्यालयों तथा टीवी चैनलों पर बैठने वाले नेताओं के जहर बुझे बयानों ने भी भड़की आग में घी का काम किया।सड़क पर पुलिस पत्थरों की, गोलियों की मार सहती है और मरती है, आम आदमी पिटता व मरता है और दंगाई बेखौफ होकर आगजनी,गोलीबारी व पत्थरबाजी कर रहे हैं? यह स्थिति देश की सत्ता को सीधे चुनौती है! इससे निपटने के लिए सुरक्षाबलों को अब खुली छूट देनी ही होगी?

दिल्ली की आस्तीन में छिपे नागों ने देश की “अतिथि देवो भव” की परंपरा को खूनी दंगो के जहर में डुबो डाला। राजधानी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आगमन के समय जिस प्रकार से आराजक तत्वों द्वारा उपद्रव किए गए वह साफ दर्शाता है कि यह किसी बड़ी साजिश का प्रायोजित ‘वार’ था? देश के नेता इन दंगों में अपना राजनीतिक फायदा लेने का मंसूबा पाले नजर आते हैं! दंगाई खुलेआम दिल्ली की सड़कों पर दुकानों को आग लगाते हैं! घरों को आग लगाते हैं! लूटपाट करते हैं! गोलियां चलाते हैं! असलहे लहराते हैं! पत्थरबाजी करते हैं! सरिया व डंडे से वार करते हैं और पूरा हमारा सिस्टम इन के आगे हाथ बांधे खड़ा नजर आता है?

दिल्ली में ऐसे अराजक तत्व कहां से एकाएक उभरकर सामने आ गए इसका भी पता लगाना अब जरूरी हो गया है।
लोकतंत्र के नाम की दुहाई देकर देश में एक फैशन चल पड़ा है। आंदोलन के नाम पर कहीं की भी, सड़क जाम कर दो? किसी भी चौराहे को जाम कर दो? रेलवे स्टेशन, मेट्रो स्टेशन को बंद करवा दो? अगर यही लोकतंत्र का अधिकार है तो देश को इसके बारे में नए सिरे से सोचना ही होगा। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि आप अपने आंदोलन के लिए किसी दूसरे के मार्ग को बाधित नहीं कर सकते !क्या कारण है कि दिल्ली में सड़क को जाम करके ही आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया जा रहा है? साफ है कि यह सब दिल्ली की आम जीवन चर्या को रोकने का प्रयास है जो कहीं न कहीं देश के विरुद्ध एक बड़ी साजिश को आवाज देता है?

बेशर्म दरिंदे दंगाइयों को शर्म नहीं आई कि देश में एक समर्थ राष्ट्र के राष्ट्रपति दौरे पर हैं और वह देश में दंगे फैला रहे हैं! अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने भाषण में भारत देश में अनेकता के बीच एकता का भाव देखते हैं। यहां कुत्सित सियासी गोद में पले दंगाई ऐसा सड़क छाप प्रहसन करते हैं कि उसे देखकर लोकतंत्र खून के आंसू रोता है?
सवाल है कि जब देश के प्रत्येक शहर व प्रदेश मुख्यालय पर लोकतंत्र के तहत अपनी बात कहने के लिए धरना स्थल निर्धारित है तो सड़कों पर अथवा रेलवे स्टेशनों पर ही धरना, जाम, प्रदर्शन करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यह भी जांच का विषय है।

हास्यास्पद यह भी है कि जब ऐसी घटनाएं होती है तब केंद्र की सत्ता इसका दोषारोपण विपक्ष पर करती है और विपक्ष के नेता इसे केंद्र सरकार की असफलता बताते हैं। शर्म तब भी आती है जब पुलिस पर पत्थरबाजी करने वाले तत्वों को शांतिप्रिय प्रदर्शनकारी बताकर देश के कई नेता बड़ी-बड़ी बातें करते हैं? कटु सत्य है कि सब कुछ वोट के लिए किया जाता है भले ही देश की आत्मा पर दंगों के घाव दर घाव दंगाई देते रहे।

दिल्ली की ही तर्ज पर देश के दूसरे अंचलों में भी सड़क पर ही धरना देकर अपने विरोध प्रदर्शन की कोशिशें की गईं !उत्तर प्रदेश में भी ऐसी ही स्थितियां सामने आईं !खासकर अलीगढ़ कुछ ज्यादा ही संवेदनशील दिखाई पड़ा !लेकिन यहां पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यवाही मॉडल ने बहुत कुछ संभाल लिया। विचारणीय है कि देश के गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली में क्यों फेल हो गए! दिल्ली के दंगाइयों को खुलेआम यह तांडव नृत्य करने की छूट बराबर अब तक क्यों दी जाती रही? दंगों में दंगाई लूटपाट करते है, पत्थर चलाते हैं, गोलियां चलाते हैं और इसमें मरता व पिटता है आम आदमी।
विपक्ष के कई नेता पुलिस को भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता मान चुके हैं? उनका केवल एक धर्म है कि कोई भी दंगा हो बस केवल पुलिस को ही निशाने पर रखना ? ऐसे नेता बड़ी-बड़ी बातें करते समय यह देखने के लिए अपनी आंखें बंद कर लेते हैं कि इस माहौल में पुलिसकर्मियों की जानें भी गई हैं। सैकड़ों पुलिस के लोग घायल हुए है? जरूरी भी है कि यदि पुलिस मनमानी करती है तो उस पर रोक लगाई जाए लेकिन केवल और केवल वोट के लिए पुलिस तथा सरकार को निशाना बनाना इसे विपक्ष का सच्चा धर्म भी नहीं कहा जा सकता?

केंद्र की मोदी सरकार दिल्ली की अराजकता को काबू करने में असफल रही है! गृह मंत्री अमित शाह ने भले ही बड़ी-बड़ी बातें की लेकिन उन्होंने भी दंगे, दिल्ली का कलंक ना बने इसके लिए पहले से कोई तैयारी नहीं की? खुफिया विभाग भी बार-बार फेल होता नजर आया और सफल होतेदिखे दंगाई?

रोती एवं सिसकती, सुलगती दिल्ली पर गौर करें तो इसके पीछे नेताओं के जहर बुझे बयानों का सहयोग भी है? ऐसे नेता अपने जहर को उगलते समय यह भूल जाते हैं कि उनके बयानों का असर आम आवाम पर क्या पड़ रहा है? उन्हें केवल एक चीज नजर आती है वह है वोट?

सी ए ए के समर्थन में अथवा उसके विरोध में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बड़े-बड़े नेता अपने घरों में बैठे रहे? जबकि सड़कों पर सस्ती राजनीति के कीड़े इंसानी खून को नालियों में बहा देने की व्यवस्था करते रहे! ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि अब देश में इस पर भी विचार होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी की मर्यादा क्या हो? लोकतंत्र, अभिव्यक्ति, अधिकार के नाम पर दूसरों के अधिकारों का हनन करना, दूसरों के खून को सड़कों पर बहाना यह राक्षसी कृत्य हैं। इसे कुचलना जरूरी है।

दंगा करने वाले न किसी जाति के खास हो सकते हैं ना किसी धर्म के खास हो सकते है। दंगाई केवल दंगाई होता है। उसे, उसी की भाषा में जवाब देकर जब तक दुरुस्त नहीं किया जाएगा स्थिति सुधरने वाली नहीं है।
दिल्ली के कई रेलवे स्टेशन आज सूने हो चुके हैं ।मेट्रो स्टेशन बंद है! जनजीवन अस्त-व्यस्त है! आखिर चंद लोग अपने आंदोलन की आड़ में ऐसा कैसे कर सकते हैं? जाहिर है कि यह सुनियोजित साजिश देश की सत्ता को सीधे चुनौती दे रही है? जिसमें देश के कई दुश्मन प्रदर्शनकारी के भेष में शामिल है?

सही है कि दंगा भड़काने वाले चाहे जिस दल के हो, चाहे जिस धर्म के हो! उनसे केवल अपराधी की दृष्टि से निपटना चाहिए। सोचनीय विषय है कि एक युवक सीधे पुलिस पर पिस्टल तान देता है। वह पुलिस के सामने फायरिंग करता है और पुलिस मूकदर्शक बनी रह जाती है। वह भी तब जब अपना कर्तव्य निभाते हुए कांस्टेबल रतन लाल की मौत हो जाती है और एसपी स्तर के अधिकारी पत्थरबाजी में घायल हो जाते हैं ।पुलिस के हाथ किसने बांधे, यह भी जांच का विषय है ?

आधा दर्जन नागरिक मौत का शिकार हुए सैकड़ों लोग भी घायल हुए ।इस स्थिति को दिल्ली में कैसे फिट किया गया? इसके पीछे किस दल के लोग हैं? उनके चेहरों को भी जनता के सामने लाना जरूरी है। क्योंकि अतिथि के आगमन के समय अपने घर अथवा देश में इस तरह का दंगा फसाद करना इतना शर्मनाक है कि उसकी शब्दों में व्याख्या नहीं की जा सकती? वास्तव में देश के दामन पर दिल्ली के दंगाई वह दाग बन गए हैं जिन्हें कड़ाई से नेस्तनाबूद करना अत्यधिक जरूरी हो गया है?

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