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Sunday, September 26, 2021
Home सम्पादकीय सार्वजनिक जगहों पर भी महफूज नहीं हैं बेटियां

सार्वजनिक जगहों पर भी महफूज नहीं हैं बेटियां

– डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

महिला सुरक्षा पर गैर सरकारी संगठनों के हाल ही में जारी सर्वे में जो तथ्य सामने आये हैं वे घोर निराशाजनक होने के साथ ही विकृत होती मानसिकता को दर्शाने वाले भी हैं। सर्वे में भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर महिलाएं सबसे अधिक असुरक्षित महसूस करती पाई गई हैं। हालांकि यह तो पहले से ही सर्वमान्य हो चुका है कि अपनों की दरिन्दगी से सबसे ज्यादा शिकार बालिकाएं होती हैं। पिछले दिनों सामाजिक संस्थान सेफ्टीपिन, कोरिया इंटरनेशनल कारपोरेशन एजेन्सी और गैरसरकारी संगठन एशिया फाउण्डेशन के सर्वेक्षणों और उनके परिणामों के विश्लेषण से जो तथ्य उभर कर आए हैं वे यही साबित कर रहे हैं कि 90 फीसदी तक महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर अधिक असुरक्षित महसूस करती हैं। यह आंकड़ा स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार 50 फीसदी महिलाएं सार्वजनिक वाहनों में छेड़छाड़ की शिकार होती हैं। इसी तरह बाजार या मेले-जलसे में छेड़खानी की शिकार होने वाली महिलाओें का आंकड़ा बहुत अधिक है। गली-मोहल्ले में छेड़छाड़ आम होती जा रही है। ऐसे में आखिर आधी दुनिया अपने आपको को कहां महफूज महसूस करेगी, यह प्रश्न तथाकथित सभ्य समाज को सोचना ही होगा। सर्वे के मुताबिक बड़े शहरों में छेड़छाड़ का आंकड़ा अधिक है।

सवाल यह कि आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं? बेटियां भी इसी समाज का महत्वपूर्ण अंग हैं। उन्हें भी इज्जत के साथ जीने का पूरा हक है। एक तरफ सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलंद करती है। दूसरी तरफ हम हैवानियत की हदें पार करते जा रहे हैं। कुछ घटनाएं तो न सिर्फ शर्मसार करती हैं बल्कि मन को मर्माहत भी करती हैं। बेटियां बाप के घर में भी सुरक्षित नहीं रह पाती हैं। इस पर न सिर्फ सरकार बल्कि समाज को भी सोचना होगा।

हैवानियत के निर्भया मामले में सात साल बाद भी न्याय पर अमल अभी दूर दिखता है। इस बीच, हैदराबाद और उन्नाव में बच्चियों से दरिन्दगी से पूरा समाज फिर शर्मसार हो गया। देश ने दूसरी बार देशवासियों का गुस्सा देखा। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुए। लोगों ने दुष्कर्मियों को सरेआम गोली मार देने की मांग की। फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर समय-सीमा के भीतर कठोर सजा देने की भी मांग की गई। संयोग देखिये कि जिस जगह पर डॉक्टर बिटिया से गैंगरेप और जलाकर मारने की घटना हुई थी, हफ्तेभर बाद उसी जगह पर पुलिस ने एनकाउन्टर में चारों आरोपितों को मार गिराया। वह बदमाशों को सीन रिक्रिएट करने घटनास्थल पर ले गई थी। जहां अपराधी पुलिस का हथियार छीनकर करने लगे थे।ऐसा साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर ने बताया। हालांकि हैदराबाद के एनकाउन्टर के पक्ष-विपक्ष में बहस भी छिड़ गई है। देश के आमजन ने पुलिस की तारीफ करते हुए जश्न मनाया है। दूसरी तरफ वुद्धिजीवियों, कई कानून विशेषज्ञों और राजनेताओं ने इसकी आलोचना भी की है। इस बीच तेलंगाना हाईकोर्ट ने दो पुलिसकर्मियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा है। इसलिए पुलिस की आलोचना या उनके एनकाउंटर की सराहना करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि यह कहना मुश्किल है कि पुलिस ने यह एनकाउंटर किन परिस्थितियों में किया। क्या पुलिस के सामने कोई अन्य विकल्प था भी या नहीं। पर, इसमें कोई दो राय नहीं कि एनकाउंटर से पहले पुलिस को सभी संभावित विकल्पों को ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन, जो बात साफ होकर उभर रही है वह यह कि लोगों का अब लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण व्यवस्था पर विश्वास डगमगाने लगा है। यही कारण है कि देशभर में एनकाउंटर का आमजन ने खुले मन से स्वागत किया। लोगों ने समाचार सुनते ही जश्न मनाना शुरू कर दिया।

हालांकि लोगों की यह खुशी हमारी व्यवस्था की पोल खोलकर भी रख देती है। याद कीजिए, निर्भया कांड के बाद समूचा देश हिल गया था। युवा सड़कों पर उतर आए थे। सरकार ने भी सख्त कानूनी प्रावधान किए। त्वरित न्याय के लिए शीघ्र सुनवाई तक की बात हुई। देशभर में आक्रोश फैला, पर अभी तक निर्भया के मामले में सजा पर अमल बाकी है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है निर्भया के बाद भी इस तरह की घटनाएं रुकी नहीं हैं। बल्कि बढ़ गई हैं, क्योंकि विकृत मानसिकता वालों को कोई सबक नहीं मिला है। महिला थानों और सुरक्षा एपों के बावजूद ‘ढाक के वही तीन पात’ वाली स्थिति सामने है। निराशाजनक यह है कि समाचार पत्रों में कोई भी दिन ही ऐसा पढ़ने को नहीं मिलता जिस दिन महिलाओं से छेड़छाड़, रेप या रेप की कोशिश का समाचार नहीं आता हो। हकीकत तो यह है कि इस तरह के समाचार नियमित कॉलम का स्थान लेते जा रहे हैं।

विचारणीय यह भी कि जब इतनी अधिक संख्या में सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षा की स्थिति सामने आए हैं तो इसके पीछे का मनोविज्ञान भी समझना होगा। समाजविज्ञानियों को इस पर भी गंभीर मंथन करना होगा कि आखिर क्या कारण है कि सार्वजनिक स्थानों और परिवहन साधनों में इस तरह की घटनाएं होती हैं तो वहां दूसरे लोग किस तरह से मूक-दर्शक बन जाते हैं। आखिर सब कुछ सरकार और पुलिस-प्रशासन पर ही नहीं छोड़ा जा सकता। एक समय था जब मोहल्ले के बड़े-बूढ़े बालिकाओं-महिलाओं के लिए शेल्टर का काम करते थे। आज स्थितियां यहां तक बदल गई हैं कि पहले माले पर रहने वालों को यह भी पता नहीं होता कि दूसरे माले पर क्या हो रहा है और कौन रह रहा है। ऐसे में महिलाओं को महफूज रखना है तो देश के प्रत्येक नागरिक को अपने दायित्व को समझना होगा। नहीं तो इस तरह की घटनाओं पर रोक दूर की कौड़ी ही सिद्ध होगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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