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Sunday, September 26, 2021
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छोटे-छोटे निर्णय बना सकते हैं महिलाओं को निर्भय

– सियाराम पांडेय ‘शांत’

उन्नाव में दुष्कर्म पीड़िता को जलाकर मार डालने का विरोध देशभर में हो रहा है। सभी दल इस घटना की आलोचना कर रहे हैं। बलात्कारियों को सजा देने के लिए कठोर कानून बनाने, यहां तक कि मृत्युदंड दिए जाने की मांग की जा रही है। न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग ऐसे मामले में अपनी विवशता, संसाधनों और तंत्र की कमी का रोना रोकर जाहिर करते रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में दो ऐसे निर्णय हुए हैं जिसका संज्ञान लिया गया तो रेप-हत्या की कौन कहे छेड़छाड़ से भी लोग दूरी बनाते दिखेंगे। इसके लिए पचास साल पहले और 19 साल पहले छेड़छाड़ के मामले में हुए दो फैसलों पर गौर करना होगा। 1969 में कानपुर में तैनात मुंसिफ खलीफा अब्दुल कादरी ने छेड़छाड़ के दोषी को न केवल अर्थदंड दिया बल्कि कानपुर के सभी थानों में गुनहगार की फोटो भी लगवा दी थी। अपने निर्णय में उन्होंने पुलिस को हिदायत दी कि वह चरित्र सत्यापन के लिए किसी भी थाने में आए तो उसमें इस बात का जिक्र जरूर करें। उनके इस निर्णय का असर यह हुआ कि तब कानपुर में छेड़छाड़ की घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से कमी आई थी।

कुछ ऐसा ही बड़ा और विचारपूर्ण निर्णय वर्ष 2000 में लखनऊ में तैनात तत्कालीन द्वितीय विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) चंद्रशेखर उपाध्याय ने छेड़छाड़ के दोषी को 2 माह की कैद और 400 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। उन्होंने भी पुलिस को निर्देश दिया था कि वह उसकी तस्वीर थानों में लगाए और वह जब भी चरित्र सत्यापन कराने थानों में आए तो उस पर स्पष्ट रूप से उसके कृत्य का जिक्र किया जाए। लखनऊ के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बीबी बक्शी ने बताया था कि इस निर्णय का असर यह रहा कि छेड़छाड़ की वारदातों में 60 प्रतिशत तक कमी आ गई थी। यह अलग बात है कि इस निर्णय को अपेक्षित फैलाव नहीं मिल पाया। अगर इस नवोन्मेषी सोच को देश के अन्य जजों ने भी आगे बढ़ाया होता तो छेड़छाड़ की घटनाएं निश्चित रूप से नगण्य हो जातीं। छेड़छाड़ करने वालों को सरकारी सेवाओं में जाने से रोकने, उन्हें सरकारी योजनाओं से वंचित करने के छोटे-छोटे निर्णय छेड़छाड़ की घटनाओं पर अंकुश लगा सकते हैं।

उन्नाव की घटना से आहत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की सुनवाई के लिए उत्तरप्रदेश में 218 नई अदालतें आरम्भ करने की बात कही है। देश में छेड़खानी और बलात्कार के बढ़ते मामले पूरे देश के लिए चिंता का सबब बने हुए हैं। बलात्कारियों को सजा देने के लिए कानून को और सख्त बनाने की मांग उठने लगी है। दुराचारियों को फांसी देने की सर्वत्र वकालत हो रही है। नवम्बर 2017 में मध्यप्रदेश की तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने बलात्कारियों को फांसी की सजा देने की न केवल घोषणा की थी बल्कि कानून में संशोधन का प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को भेज दिया था। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, हरियाणा और राजस्थान की तत्कालीन सरकारों ने भी फांसी की सजा पर विचार करने की बात की थी।

15 साल पहले अगस्त 2004 को कोलकाता की अलीपुर जेल में धनंजय चटर्जी को 15 साल की एक छात्रा से दुष्कर्म के मामले में फांसी पर लटका दिया गया था। वह मुकदमा भी 15 साल तक चला था। इसके बाद ही धनंजय को फांसी की सजा हो पाई थी। अपने देश में बलात्कार रोकने के लिए तमाम कानूनी प्रावधान हैं। लेकिन मुकदमों की सुनवाई की लंबी और जटिल प्रक्रिया ने अपराधियों के मन से डर निकाल दिया है।

मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जहां नाबालिग से बलात्कार के मामले में फांसी की सजा के कानून के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया है। महिलाओं का पीछा करने, छेड़छाड़, निर्वस्त्र करने, हमला करने और बलात्कार का आरोप साबित होने पर न्यूनतम जुर्माना एक लाख रुपये लगाया जाएगा। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को ऐसा कानून लाने का सुझाव दिया है जिससे नाबालिगों से दुष्कर्म करने वाले को मृत्युदंड दिया जाए ताकि ऐसे अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संदेश जाए। न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की पीठ ने पिछले साल निचली अदालत द्वारा एक व्यक्ति को सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की।

प्रश्न यह है कि फांसी की सजा का प्रावधान बना देने भर से क्या ये घटनाएं बंद हो जाएंगी? हत्या के आरोप में फांसी की सजा का प्रावधान तो है लेकिन क्या इससे हत्याएं होना बंद हो सकीं? एक बार संसद में पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि कानून चाहे जितने बना लिए जाएं, जब तक मामलों के निस्तारण के लिए एक टाइम फ्रेम नहीं तय होगा, तब तक कुछ नहीं हो सकता। दिल्ली के निर्भया काण्ड में जिन लोगों को सजा मिली, क्या उस पर अमल हो सका है?

1996 का सूर्यनेल्ली बलात्कार मामला तो रोंगटे खड़ा कर देने वाला है। 16 साल की स्कूली छात्रा को अगवा कर 40 दिनों तक 37 लोगों ने बलात्कार किया था। इस मामले में कांग्रेस नेता पीजे कुरियन का नाम भी उछला था। नौ साल बाद 2005 में केरल हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपित के अलावा सभी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के आदेश दिए। इस बार सात को छोड़ ज़्यादातर को सजा हुई, लेकिन कई आरोपित अभी भी कानून की पहुंच से बाहर हैं।

1996 में दिल्ली में लॉ की पढ़ाई कर रही प्रियदर्शनी मट्टू की उसी के साथी ने बलात्कार कर नृशंस हत्या कर दी थी। अपराधी संतोष सिंह पुलिस के बड़े अधिकारी का बेटा है। बेटे के खिलाफ केस दर्ज होने के बावजूद उसके पिता को दिल्ली पुलिस का ज़्वाइंट कमिश्नर बना दिया गया। जांच में पुलिस ने इतनी लापरवाही बरती कि चार साल बाद सबूतों के अभाव में निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया। जब तक मामला हाईकोर्ट पहुंचा, संतोष सिंह खुद वकील बन चुका था और उसकी शादी भी हो चुकी थी, जबकि प्रियदर्शनी का परिवार उसे न्याय दिलाने के लिए अदालतों के बंद दरवाजों को बेबसी से खटखटा रहा था। 11वें साल में हाईकोर्ट ने संतोष सिंह को मौत की सजा सुनाई, जिसे 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में तब्दील कर दिया।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में देश की विभिन्न अदालतों में चल रहे बलात्कार के 152165 नए-पुराने मामलों में केवल 25 का निपटारा किया जा सका, जबकि उस एक साल में 38947 नए मामले दर्ज किए गए। यह केवल दुष्कर्म के आंकड़े हैं। बलात्कार की कोशिश, छेड़खानी जैसी घटनाएं इसमें शामिल नहीं है। साल 2012 में दिल्ली के चर्चित निर्भया गैंगरेप मामले के वक्त भी ऐसा ही माहौल था। लाखों की तादाद में लोग सड़कों पर उतर आये थे। जनता के आक्रोश का ही असर था कि वर्मा कमिशन की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने नया एंटी रेप लॉ बनाया। इसके लिए आईपीसी और सीआरपीसी में तमाम बदलाव किए गए और सख्त कानून बनाए गए। साथ ही रेप को लेकर कई नए कानूनी प्रावधान शामिल किए गए। लेकिन इतनी सख्ती और इतने आक्रोश के बावजूद रेप के मामले नहीं रुके। आंकड़े यही बताते हैं। दिल्ली में साल 2011 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में 277 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। निर्भया कांड के बाद दिल्ली में दुष्कर्म के दर्ज मामलों में 132 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों को रोकने के लिए जरूरी है कि ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए। उन्हें हर तरह की सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए। उनके चित्र हर कहीं सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाएं। लेकिन यह सब तभी किया जाए जब दोष प्रमाणित हो जाए। ऐसा कर हम देश की आधी आबादी के सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा कर सकते हैं ।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)

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