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Sunday, September 26, 2021
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असुरक्षित क्यों हैं बेटियां

– प्रभुनाथ शुक्ल

हैदराबाद में महिला डॉक्टर दिशा (काल्पनिक नाम) के साथ बलात्कार फिर जलाकर मार डालने की घटना से पूरा देश उबल रहा है। संसद से सड़क तक माहौल गरम है। लेकिन यह गुस्सा और ऊबाल कब तक रहेगा? टेलीविजन पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कब तक बहसें चलती रहेंगी? संसद में महिला सांसदों के आंसू कब तक टपकते रहेंगे? दिल्ली का जंतर-मंतर कब तक आमरण अनशन का स्थल बनता रहेगा? कानूनी किताबों में महिला सुरक्षा को लेकर किए गए दावे जमीन पर कब उतरेंगे? बलात्कार के गुनहगारों को फांसी की सजा कब मिलेगी? निर्भया, कठुवा और मुम्बई के शक्ति मिल जैसे अनगिनत घटनाओं के दोषियों को सजा कब तक मिलेगी? त्वरित गति न्यायालय यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट से दोषियों को सजा मिलने के बाद भी फांसी क्यों नहीं दी गई? निर्भया के चार दोषियों को फांसी सजा मिल चुकी है, लेकिन अभी तक उन्हें फांसी पर नहीं लटकाया गया। कुछ ऐसा ही हाल मुंबई के शक्ति मिल का भी है।

कठुवा गैंग रेप मामले में भी अभी पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल सका है। एसपीजी सुरक्षा बिल पर संसद से वाक आउट करने वाले राजनेता क्या हैदराबाद की घटना पर अपनी चुप्पी तोड़ेंगे? जिस हैदराबाद में यह घटना हुई वहां के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की तरफ से अभी तक अफसोस के एक शब्द नहीं जाहिर किए गए। जबकि अयोध्या मसले के सवाल पर उन्होंने कहा है कि अयोध्या में कुछ भी बने वहां बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। देश बांटने वाले ऐसे बेशर्म नेताओं से समाज क्या उम्मीद कर सकता है? बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओं का नारा देने वाली सरकार ने आखिर बेटियों की सुरक्षा के लिए कौन-सी बेहतर पहल की है? तेलंगाना के मुख्यमंत्री नीरो बने हैं। पूरे देश में बेटियां न्याय के लिए गुहार लगा रही हैं और केसीआर दिल्ली में शादी समारोह के मजे ले रहे हैं। पीड़ित परिवार के पास संवेदना के दो शब्द जताने भी नहीं पहुंचे। राजनेताओं को इसका जवाब भी देना होगा।

बलात्कार की घटनाओं पर राजनीति की जाती है। चर्चित होने का मौका ढूंढा जाता है। राज्यसभा में सामाजिक हस्ती जया बच्चन को अपनी बात रखते हुए आंसू टपक पड़े। उन्होंने बलात्कार के आरोपियों को खुलेआम लिंचिंग करने की बात कह दी। इस पर कई लोगों ने ट्वीट के जरिए विरोध भी किया। कानून-व्यवस्था का सवाल उठाने लगे। सवाल यह कि कानूनी प्रक्रियाओं के तहत अब तक निर्भया, शक्ति मिल और कठुवा जैसी हजारों घटनाओं के मामले में पीड़ित परिवार को न्याय क्यों नहीं मिल सका? जया बच्चन ने जो सवाल उठाया है उस पर राजनीति की बजाय अमल होना चाहिए। बलात्कार की घटना देश के लिए सामाजिक कलंक है। इस पर त्वरित कारवाई होनी चाहिए। लेकिन इस पर राजनीति हो रही है।

हैदराबाद की घटना को लेकर पूरे देश में उबाल और गुस्सा है। लेकिन बलात्कार की समस्या से फिलहाल निजात की कोई उम्मीद दिखती नहीं मिलती। महिलाओं को लेकर पुरुषों के दिमाग में जो मनोवृत्ति समाई है, वह मिटनेवाली नहीं है, जब तक सख्त सजा न मिले। हैदराबाद की डॉक्टर के साथ जो कुछ हुआ वह बेहद गलत हुआ। भला हो सोशल मीडिया का जिसने इस घटना को राष्ट्रीय मीडिया में ला खड़ा किया। संसद में महिला सांसदों में काफी ऊबाल है। जया बच्चन, रुपा गांगुली, हेमा मालिनी, हरसिमरत कौर बादल, सरोज पाण्डेय, दीपा कुमारी सभी ने कड़ी सजा की मांग की है। लेकिन हमारी सरकारें और व्यवस्था इसे कब अमली जामा पहनाती है, यह देखने की बात है। इस बीच पंजाब सरकार ने एक उम्मीद की किरण जगाई है। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने एक आदेश जारी किया है जिसमें महिलाओं की सुरक्षा के लिए पीसीआर वैन सुविधा उपलब्ध कराई गई है। कोई भी महिला अकेले होने पर इस सुविधा का लाभ उठा सकती है। इस वैन में एक महिला सिपाही की भी नियुक्ति होगी। यह सेवा रात नौ बज से सुबह छह बजे तक रहेगी। जिसे काल कर मदद के लिए बुलाया जा सकता है। पंजाब सरकार की यह अच्छी पहल है।

अपने देश में बलात्कार के मामले बेहद भयावह हैं। औसतन एक घंटे में बलात्कार की पांच घटनाएं होती हैं। आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार की हर चार घटनाओं में सिर्फ एक में आरोपितों को सजा मिल पाती है। हर साल 40 हजार बलात्कार के मामले पुलिस रिकार्ड में दर्ज होते हैं। बलात्कार के 30.9 फीसदी मामलों के निपटान में एक से तीन साल का समय लग जाता है। जबकि 30.2 फीसदी मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई। 8.9 फीसदी मामलों के फैसले में 9-10 साल लग गए। देश में सिर्फ 25 फीसदी घटनाओं में ही बलात्कारियों को सजा मिल पाती है। हालांकि सजा पर अमलीकरण का आंकड़ा बेहद कम है। देश में केवल 10 साल में बलात्कार के 2.79 लाख मामले रिकार्ड किए गए। एक नाबालिग छात्रा से बलात्कार के मामले में कोलकाता के धनंजय चटर्जी को फांसी पर लटकाया गया था। लेकिन इसके बाद भारत में कोई फांसी नहीं दी गई।

भारत में बढ़ती बलात्कार की घटनाओं से महिलाओं, बेटियों और कामकाजी महिलाओं को क्या निजात मिल पाएगी? क्या कड़े कानून बनाकर हम बलात्कार को रोक सकते हैं? बलात्कार की घटना हमारे सामाजिक सोच और नैतिकता से जुड़ी है। घर में हम जिस ईमानदारी से रहते हैं, जब तक वह नैतिकता खुली सड़क पर नहीं अपनाएंगे तब तक बलात्कार की घटनाओं पर विराम लगने से रहा। सिर्फ कड़ा कानून इसका समाधान नहीं हो सकता है। एक लड़की जब खुली सड़क पर गुजरती है तो उस पर सैकड़ों आंखें टूट पड़ती हैं।

लड़कियों को हमने संस्कार, मान और सम्मान की गठरी में बांध रखा है। हमने जो संस्कार बेटों को दिया अगर वही बेटियों को देते तो आज इस बेशर्मी से सिर न झुकाने पड़ते। श्रीराम, बौद्ध, कृष्ण, विवेकानंद के देश में सीता, गीता, गायत्री का खुलेआम रावण और दुशासन चीरहरण कर रहे हैं। हालात बेहद बुरे हो चुके हैं। समाज के दरिंदों ने हैवानियत की हदें पार कर दी हैं। मासूम बच्चियों से लेकर बूढ़ी औरतों तक का चीरहरण किया जा रहा है। महिला सुरक्षा के लिए जाने कितने ऐप, हेल्पलाइन और मोबाइल नम्बर उपलब्ध हैं, बावजूद दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है। ऐसे अपराधियों के प्रति किसी प्रकार की सहूलियत नहीं दी जानी चाहिए। पीड़ित परिवारों में न्याय की उम्मीद खत्म न हो इसका पूरा खयाल किया जाना चाहिए। समय रहते इस पर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और बुरी होने वाली है।

(लेखक पत्रकार हैं।)

शुभांकुर पाण्डेय प्रधान कार्यालय
प्रधान संपादक- शुभांकुर पाण्डेय
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