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Wednesday, July 28, 2021
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वाद-विवाद-संवाद ही लोकतंत्र की शक्ति

– हृदयनारायण दीक्षित

लोकतंत्र सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। सबकी भागीदारी लोकतंत्र का उद्देश्य है। विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की मूल ऊर्जा है। सबके अपने विचार होते हैं। विचार के आधार पर राजनीतिक दल बनाए जाने चाहिए। विचार आधारित दल विचार प्रकट करने की आजादी का सदुपयोग करते हैं तो समाज में विचार आधारित दल समूह बनते हैं। वे परस्पर संवाद करते हैं। लोकतंत्र वाद-विवाद-संवाद से ही शक्ति सम्पन्न होता है। राजनीतिक दल तंत्र को जनसंवाद बनाते समय तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए। तथ्यगत त्रुटि के अभाव में बात का बतंगड़ बनता है। उ.प्र. के उन्नाव जिले में किसानों को लेकर कई दलों ने ऐसी ही गलती की। वे सोशल मीडिया की गिरफ्त में आए। जग हंसाई हुई। कांग्रेस की ओर से पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी ने कथित पुलिस अत्याचार वाला एक वीडियो जारी किया। उसमें एक व्यक्ति लेटा हुआ था। यह वीडियो का एक भाग था। पूरे वीडियो में वही व्यक्ति तेज रफ्तार चलता हुआ देखा गया। वह तेज रफ्तार गतिशील था। तथ्य गलत निकला। राष्ट्रीय पदाधिकारी ने पोस्ट हटाई। किसानों को भूमि का मुआवजा न मिलने, उत्पीड़न व पुलिस लाठीचार्ज की बातें भी कही गईं। मामले को राजनीतिक रूप में इस्तेमाल करने के प्रयास अभी भी हो रहे हैं।

आन्दोलनों से लोकतंत्र मजबूत होता है। सत्य निष्ठा से युक्त आन्दोलन जनमानस में स्वस्थ राजनीतिक चेतना का संचार करते हैं। गांधी, लोहिया, जयप्रकाश नारायण और पं. दीनदयाल उपाध्याय आन्दोलन संगठित करते समय मुद्दों का गहन परीक्षण करते थे। वे सत्य की तह तक जाते थे। ऐसे आन्दोलनों ने भारत की राजनीतिक संस्कृति का विकास किया था। 1942 के पूर्व राष्ट्रवादी आन्दोलन की तैयारी के समय गांधी जी ने सहयोगियों को झिड़कते हुए कहा था कि मुझे कोंच-कोंचकर जल्दबाजी में आन्दोलन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। आन्दोलन का खाका बनाते समय अतिरिक्त जागरूकता और सजगता की जरूरत होती है। अब प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में फोटो खींचने वाला मोबाइल है। हम राजनीतिक कार्यकर्ताओं की प्रत्येक गतिविधि की वीडियोग्राफी हो रही है। उन्नाव के मामले में विपक्ष से बड़ी चूक हुई। किसानों से सहानुभूति स्वाभाविक है। मैं स्वयं उन्नाव का राजनीतिक कार्यकर्ता हूं। किसान हमारे परिजन हैं। उनके दुख में भागीदारी हमारा कर्तव्य है। लेकिन सहानुभूति का राजनीतिकरण उचित नहीं है। सोशल मीडिया ने यह गलती पकड़ ली है।

पीछे दो दशक से आन्दोलन की प्रवृत्ति बदली है। गांधी जी के आन्दोलनों में सत्य आग्रह का मूल तत्व था। आग्रह कैसा भी हो सकता है। बुरा और अच्छा भी। गलत आग्रह दुराग्रह कहलाता है और दुराग्रह में लोकमंगल नहीं होता। आधुनिक संचार तकनीक दुराग्रह को पकड़ लेती है। सत्याग्रह में सत्य की शक्ति होती है। सत्याग्रही आन्दोलन तात्कालिक मुद्दों को प्रभावी बनाते हैं। ऐसे आन्दोलनों से सत्यनिष्ठा वाले आन्दोलन संस्कृति का विकास भी होता है। सत्य आग्रह दलतंत्र को भी प्रतिष्ठित करते हैं। झूठ के आग्रह दल/नेता को अपयश देते हैं और पूरे दलतंत्र की बदनामी होती है। भारत का स्वाधीनता आन्दोलन सत्याग्रही था। इसका ध्येय भारतीय स्वाधीनता था। दलीय आग्रह नहीं थे। संस्कृति इस आन्दोलन की प्रेरणा थी।

संप्रति संस्कृति और सत्याग्रह का अभाव है। सोनिया जी के परिवार की एस.पी.जी. सुरक्षा को लेकर प्रदर्शन हुआ। एक टी.वी. एंकर ने नारेबाजी, धक्कामुक्की करते नवयुवकों से पूछा कि आप यह सब क्यों कर रहे हैं? एक नवयुवक ने कहा कि यह बात हमको नहीं मालूम है। वह चिल्लाया – तानाशाही नहीं चलेगी। एंकर ने दोबारा पूछा। उसने नहीं मालूम दोहराया। एंकर ने अगले से पूछा। उसने कहा – हमें नौकरी चाहिए। एंकर ने फिर पूछा कि यह आन्दोलन सुरक्षा को लेकर है। युवक ने कहा – ‘हमारी सुरक्षा भी चाहिए।’ प्रदर्शनकारियों को भी आन्दोलन का मुद्दा न मालूम होना आश्चर्यजनक है। सामान्यतया आन्दोलनों में शामिल लोग पीड़ित होते हैं। पीड़ित से सहानुभूति रखने वाले होते हैं और सम्बंधित दल के कार्यकर्ता भी होते हैं। ऐसे सभी लोगों को आन्दोलन के लक्ष्य उद्देश्य व मांग पत्र की जानकारी होती है।

वर्तमान प्रदर्शनों में भागीदारी करने वाले लोग स्वप्रेरित नहीं होते। वे मुद्दा प्रेरित भी नहीं होते। उन्हें मुद्दे की जानकारी दी ही नहीं जाती। टी.वी. और सोशल मीडिया ऐसी हास्यास्पद घटनाएं पकड़ लेता है। उन्नाव के प्रसंग में निजी अनुभव जोड़ सकते हैं। मैंने हजारों की भागीदारी वाले पुलिस अत्याचार विरोधी प्रदर्शन आयोजित किए। हम पुलिस उत्पीड़न की घटनाएं लेकर गांव-गांव जाते थे। घटनाओं के सत्य तथ्य जुटाते थे। आमजनों को जानकारी देते थे। आन्दोलन के लिए प्रेरित करते थे। सबको आन्दोलन के मुद्दों की जानकारी होती थी। मीडिया के सजग लोग तब भी किसानों, गरीबों से आन्दोलन के उद्देश्य के सम्बंध में प्रश्न करते थे। सही उत्तर पाते थे। मूलभूत प्रश्न है कि विरोध का मुद्दा तय करते समय तथ्यों पर सम्यक समग्र विचार करने में कठिनाई क्या है? विरोध प्रदर्शन की हड़बड़ी क्यों है?

जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974-75 में संपूर्ण क्रान्ति आन्दोलन हुआ था। संस्थागत भ्रष्टाचार केन्द्रीय विषय था। आन्दोलन से समाज के चित्त को बदलने का लक्ष्य था। प्रत्येक आन्दोलनकारी को स्वतंत्र भारत के कम से कम दो आन्दोलनों की संस्कृति ध्यान से देखनी चाहिए। जे.पी. के नेतृत्व वाले आन्दोलन से पूरा भारत आन्दोलित था। इसी तरह अयोध्या आन्दोलन में भी भारत का अवनि अम्बर उद्वेलित था। दोनों आन्दोलनों के मुद्दे सुस्पष्ट थे। आन्दोलनकारी मुद्दों से ध्येय प्रेरित थे। उत्पीड़न, लाठीचार्ज व कारागार आन्दोलन को नहीं दबा पाए। सत्य तथ्य की प्रतिबद्धता के परिणाम आते ही हैं। दोनों आन्दोलनों के परिणाम सर्वविदित हैं।

आन्दोलन समाज का रसायनिक संगठन बदलते हैं। स्वाधीनता आन्दोलन के समय देश की तमाम अस्मिताएं उभार पर थीं। स्थानीय क्षेत्रीय अस्मिताओं को राष्ट्र की एकताबद्ध चेतना से जोड़ना आसान नहीं था। लेकिन राष्ट्रीय आन्दोलन की ऊर्जा से भारतीय राष्ट्रवाद लगातार बढ़ता गया। आन्दोलन से भारत का पौरूष पराक्रम प्रकट हुआ। सत्यनिष्ठा के कारण ही आन्दोलन दीर्घकाल तक चला था। राष्ट्रीय आन्दोलन से एक विशेष आन्दोलन संस्कृति का विकास हुआ और एक उदात्त राजनीतिक संस्कृति का भी। दुर्भाग्य से उस राजनीतिक संस्कृति का ह्रास हुआ और अब प्रदर्शन ‘फास्ट फूड’ हो गए। विज्ञापन बोलते हैं – थोड़ी-सी मिठाई, कहीं भी, कभी भी। इसी तर्ज पर छोटा-सा प्रदर्शन, उग्र आक्रामकता, कभी भी, कहीं भी। यात्री बस या कार से धक्का। चटपट आन्दोलन, फटाफट रोड जाम। पुलिस से गुत्थम-गुत्था। फोटो, फेसबुक, ट्विटर, बयानबाजी, नेताओं के दौरे। स्थानीय घटना लेकिन बड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया वगैरह-वगैरह।

प्रदर्शन, आन्दोलन उच्चस्तरीय पवित्र लोकतंत्री उपकरण हैं। राजनीतिक समाज के गठन में इनकी भूमिका है। इनका सम्यक प्रयोग ही शुभ परिणाम लेता है। अन्यथा क्षति ही होती है। सम्यक विचार-विमर्श में ही लोकतंत्र की प्रतिष्ठा है। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदुपयोग ही समय का आह्वान है।

(लेखक उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)

शुभांकुर पाण्डेय प्रधान कार्यालय
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