बीएचयू विवाद : विरोध चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी का

– सियाराम पांडेय ‘शांत’

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। काशी के कुछ संत और धर्माचार्य भी इस नियुक्ति के खिलाफ हैं। प्रो. फिरोज खान की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। उनकी नियुक्ति में सनातन धर्म की अनदेखी किए जाने का आरोप लगाया जा रहा है। इन सारे आरोपों के बीच विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय की भावना भी कठघरे में खड़ी हो गई है। विपक्ष के स्तर पर सरकार को जमकर घेरा जा रहा है। उसपर योग्यता की बजाय धर्म को तरजीह देने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यह और बात है कि भाजपा और संघ के नेता भी नवनियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसर फिरोज खान के समर्थन में खड़े हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन और चांसलर गिरधर मालवीय तक प्रो. फिरोज खान के पक्ष में आ गए हैं। छात्र कह रहे हैं कि महामना ने विश्वविद्यालय में शिलापट्ट लगवाया था कि इस विभाग में सनातन धर्म मानने वालों का ही प्रवेश मान्य है लेकिन महामना मदन मोहन मालवीय के प्रपौत्र गिरधर मालवीय इसे सिरे से नकारते हैं। उनके हिसाब से महामना ऐसा कर ही नहीं सकते। यह शिलापट्ट किसी प्रिंसिपल या प्राध्यापक के स्तर पर लगवाई गई हो सकती है। वे फिरोज खान की नियुक्ति को सही मानते हैं। उनका मानना है कि अगर आज महामना होते तो वे डॉ. फिरोज खान के नाम पर पहले मुहर लगाते। उनकी दृष्टि बहुत विशाल थी, उनमें जरा-सी संकीर्णता नाम की चीज नहीं थी। वह उदारवादी थे। जब उन्होंने कहा था कि हरिजनों को मंत्र देंगे, तब बनारस के पंडितों ने उनका जमकर विरोध किया था। इसके बाद भी महामना अपने निर्णय पर अडिग रहे।

अन्य विभाग के छात्रों ने भी फिरोज खान के समर्थन में नारेबाजी की है लेकिन इन सबके बीच हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए, भजन गाते हुए धरने पर बैठे संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों के सवालों और चिंताओं को नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दलों के विरोध का आधार मजहब है लेकिन छात्रों के सवालों में दम है। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग के अध्यक्ष पर अगर अंगुलियां उठ रही हैं तो क्यों? पहली बात तो यह कि क्या संबंधित प्राध्यापक ने अपने प्रिय छात्र को उपकृत करने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत पद सृजित कराया। इस पद के लिए 29 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया, उनमें से विश्वविद्यालय ने केवल दस अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया। पैनल में दो एक्सपर्ट जयपुर से बुलाए गए और उस संस्थान से बुलाए गए, जिससे फिरोज खान पढ़े हैं। बीएचयू के संस्कृत साहित्य विभाग के अध्यक्ष राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानम में पहले पदस्थ भी रह चुके हैं और फिरोज खान की पीएचडी भी उन्हीं के निर्देशन में हुई है। चयन पैनल में कुलपति प्रो. राकेश भटनागर, संस्कृत धर्म विज्ञान संकाय के प्रमुख विंध्येश्वरी राम मिश्र, साहित्य संकाय के अध्यक्ष प्रो. उमाकांत चतुर्वेदी शामिल रहे। सवाल यह है कि जिस छात्र ने चतुर्वेदी के निर्देशन में पीएचडी की, उसे ही पैनल ने दस में दस नंबर क्यों दिए? नौ अभ्यर्थियों को दस में शून्य अंक क्यों मिले और अगर ये अभ्यर्थी इतने ही कमजोर थे तो उन्हें अन्य 19 आवेदनकर्ताओं पर तरजीह क्यों दी गई? क्या जान-बूझकर कमजोर अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया, जिससे कि अपने प्रिय छात्र को एडजस्ट किया जा सके। जांच तो इस बात की होनी चाहिए। काशी हिदू विश्वविद्यालय में एक पखवारे से अधिक समय से धरना दे रहे छात्रों के सवालों का भी जवाब देना होगा।

सारे सवाल प्रक्रियागत हैं। छात्रों का पहला सवाल है कि प्रो. फिरोज खान की नियुक्ति में विश्वविद्यालय ने यूजीसी की किस शार्ट लिस्टिंग प्रक्रिया को अपनाया? क्या विश्वविद्यालय के संविधान के अनुसार नियुक्ति हुई है? क्या 1904, 1906, 1915, 1955, 1966 व 1969 के बीएचयू एक्ट को केंद्र में रखकर नियुक्ति की गई है? संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में क्या संकाय के अन्य सभी विभागों के अनुरूप ही शार्ट लिस्टिंग हुई? क्या संकाय के सनातन धर्म के नियमों को ध्यान में रखा गया है? क्या विश्वविद्यालय इन सवालों के जवाब दे पाने की स्थिति में है। फिरोज खान को भले ही राजनीतिक दलों और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का समर्थन मिल रहा हो लेकिन नियुक्ति से जुड़े सवाल गहन जांच की मांग तो करते ही हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन धरना दे रहे छात्रों को किसी के द्वारा बरगलाया गया बताकर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता।

कई मुस्लिम नेताओं ने कहा है कि अगर फिरोज खान की नियुक्ति रोकी गई तो दुनिया भर में इसका गलत संदेश जाएगा कि भारत में योग्यता के आधार पर नहीं, धर्म के आधार पर नियुक्ति दी जाती है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्र कदाचित मुस्लिम शिक्षक से संस्कृत पढ़ना नहीं चाहते या फिर उन्हें इस बात का ऐतराज है कि किसी मुस्लिम शिक्षक के साथ वे कर्मकांड का अभ्यास करेंगे भी तो किस तरह? कोई मुस्लिम शिक्षक छात्रों के साथ बैठ रुद्राभिषेक करा सकता है क्या? इस लिहाज से देखें तो यह नियुक्ति महामना मदनमोहन मालवीय की भावनाओं पर भी कुठाराघात है। नैतिकता और ईमानदारी के पैमाने पर भी खरी नहीं है। यदि पूरे प्रकरण की किसी जांच एजेंसी से जांच कराई जाए तो सच्चाई खुलकर सामने आ जाएगी और कई लोगों के चेहरे अनावृत होंगे।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को वैश्विक स्वरूप देने, काशी को सर्व विद्या की राजधानी घोषित करने के साथ ही महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के मन में सनातन धर्म, परम्पराओं, पूजा और कर्मकांड के मूल स्वरूप को जीवंत रखने के लिए एक परिकल्पना थी। इस परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए ही उन्होंने बीएचयू में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की स्थापना की थी। उनका सपना पंडित, पुरोहित और आचार्यों को सही प्रशिक्षण देकर सनातन एवं वैदिक पुजारी एवं प्रचारक तैयार करना था। यह शिक्षा वही दे सकता है जो रुद्राभिषेक से लेकर यज्ञकर्म और सनातन कर्मकांड कराने में न केवल पूरी तरह पारंगत हो बल्कि छात्रों के साथ बैठकर यह कर्म कराने का नियमित अभ्यास करा सके । इसके लिए इस संकाय हेतु महामना अपने जीवन काल में ही कुछ नियम बना गये थे। यह नियम संकाय के बाहर और भीतर अंकित भी है।

संस्कृत भाषा कोई पढ़े-पढ़ाए, इसमें किसी का क्या विरोध हो सकता है? आंदोलनकर्मी छात्र भी बार-बार यही कह रहे हैं कि फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत विभाग में कर दी जाए, हमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन रुद्राभिषेक क्या कोई मुस्लिम करा सकता है? वह उतनी ही योग्यता व दक्षता से उसका प्रशिक्षण दे सकता है? इस मामले का विरोध कर रहे लोगों को यह बताना होगा कि उर्दू-फारसी पढ़कर कितने हिन्दू या ईसाई नमाज या कलमा पढ़ा रहे हैं? अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ के निदेशक डॉ. चंद्रप्रकाश का नजरिया कुछ और ही है। उनका कहना है कि डॉ. फिरोज को वहां शिक्षा देने से कोई नहीं रोक सकता है। वह वहां संस्कृत पढ़ा सकते हैं लेकिन, धर्म विज्ञान संकाय में शिक्षा देने के साथ तमाम कर्मकांड भी होते हैं, उसमें कोई मुस्लिम कैसे भाग ले सकता है?

इन सवालों का जवाब आज नहीं तो कल विश्वविद्यालय प्रशासन और नियुक्ति के समर्थक राजनीतिक दलों को देना होगा। बेहतर होगा कि सरकार इस नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराए और माहौल बिगाड़ने वाले जिम्मेदारों पर उचित कार्रवाई करे, यही वक्त का तकाजा भी है।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)