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Sunday, September 26, 2021
Home सम्पादकीय क्यों हुआ जेएनयू में स्वामी विवेकानंद का अनादर

क्यों हुआ जेएनयू में स्वामी विवेकानंद का अनादर

– आर.के. सिन्हा

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फीस बढ़ोतरी के विरोध की आड़ में टुकड़े-टुकड़े गैंग एकबार फिर से सक्रिय हो गया है। जेएनयू में बढ़ी फीस वापस लिए जाने के बाद स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ करना निंदनीय होने के साथ घृणित भी है। जेएनयू से संसद तक मार्च और राष्ट्र विरोधी विचारों को स्थापित करने के प्रयास को किसी भी तरह से सही नहीं माना जा सकता है। देश के शीर्ष विश्वविद्यालय से निकला यह संदेश पूरे विश्व में देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला है। जेएनयू में बौद्धिकता के नाम पर केंद्र की सरकार विरोधी रवैया के साथ राष्ट्रीय मीडिया के खिलाफ नारेबाजी के दौरान छात्रों की भीड़ में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल गैर संवैधानिक भी है। फीस बढ़ोतरी को वापस लिए जाने के बाद भी लगातार विरोध प्रदर्शन करना इस बात को दर्शाता है कि छात्रों की अगुवाई करने के नाम पर कुछ लोग शिक्षा के मंदिर के माहौल को बिगाड़ना चाहते हैं। इनकी साफ मंशा है कि जेएनयू में शिक्षा का माहौल किसी भी तरह से न रहे। इनके नापाक मंसूबों को समझने के साथ ऐसे लोगों के चेहरे के पीछे छिपे चेहरों को भी बेनकाब करना होगा कि ये लोग किसके इशारे पर विश्वविद्यालय और कुलपति विरोधी अभियान चला रहे हैं।

जब जेएनयू के कुलपति जगदीश कुमार ने रविवार (17 नवंबर) को विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर छात्रों से अपील की कि वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें क्योंकि परीक्षाएं नजदीक हैं। उन्होंने कहा है कि आपलोग कक्षाओं में लौट आइए, हड़ताल पर अड़े रहने से उनके भविष्य पर असर पड़ेगा। लेकिन हड़ताल करने वाले छात्रों के एजेंडे में कुलपति को हटाने के लिए हरसंभव कोशिश करना है न कि उनकी बात को मानना। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान जेएनयू से संसद तक मार्च करने की नीति किसी मुद्दे के समाधान के बजाय सिर्फ लाइम लाइट में आने की साजिश लगती है। विश्वविद्यालय में शिक्षा का माहौल खराब करने के बाद अब सामान्य लोगों के जनजीवन को भी प्रभावित करने की यह साजिश मालूम पड़ती है।

इस बीच राज्यसभा में जेएनयू के छात्रों पर 18 नवम्बर को दिल्ली में पुलिस के कथित एक्शन पर हंगामा हुआ। कुछ सदस्यों ने पुलिस कारवाई की निंदा की। इसमें कोई शक नहीं है कि पुलिस छात्रों पर कठोर कार्रवाई करने से बच सकती थी। पर, एक सवाल यह भी है कि जेएनयू के छात्रों को निषेधयता तोड़ने का अधिकार किसने दे दिया। दिल्ली पुलिस छात्रों को बार-बार समझा रही थी कि उन्हें संसद में मार्च की इजाजत नहीं है। इसके बावजूद छात्र पुलिस की घेराबंदी तोड़ते रहे। क्या छात्रों के व्यवहार को उचित ठहराया जा सकता है? निश्चित रूप से जो कुछ हुआ उनकी भर्त्सना की जानी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई भी होगी पर भारत के इतने प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्रों को भी समझना होगा कि वे कानून से ऊपर नहीं हैं। 18 नवम्बर को ही केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने जेएनयू के छात्रों की मांगों पर विचार करने के लिए एक कमिटी का गठन कर दिया था पर छात्र तो मार्च निकालने पर आमदा थे। वे एक तरफ आरोप लगा रहे थे कि जेएनयू वीसी उनसे मिलते नहीं। जबकि दूसरी ओर छात्रों की मांगों पर विचार किया जाता है तो वे उससे संतुष्ट नहीं होते हैं। छात्रों का इस तरह का आचरण अशोभनीय है।

जेएनयू कैंपस में गए मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल को कई घंटों तक जिस तरह से हड़ताल करने वालों ने घेरा था, इससे यह पता चल रहा है कि यहां पढ़ाई के नाम पर कई वर्षों से जमा छात्र रिसर्च के नाम पर सत्ता और शक्ति का केंद्र स्थापित करने की साजिश को अंजाम दे रहे हैं। आज देश के किसी भी कोने में जेएनयू का नाम लेने भर से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। जैसे लगता है कि यह विश्वविद्यालय न होकर देश विरोधी और गलत कार्यों का केंद्र बनता जा रहा है। पहले देश को बांटने वालों ने आजाद देश में आजादी की मांग कर लोगों को गुमराह करने की साजिश की थी।

अभी हाल ही में जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने को बाद भी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में टुकड़े-टुकड़े गैंग फिर से सक्रिय हो गया था। तब विश्वविद्यालय परिसर में रात के अंधेरे में नारेबाजी के दौरान आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल के साथ सेना को लेकर भी अपशब्दों का प्रयोग किया गया था। जिसके कारण जेएनयू परिसर कई दिनों से छावनी में तब्दील हो गया है। एक ओर विश्वविद्यालय में हॉस्टल नियमों का विरोध तो दूसरी ओर सुरक्षा के लिए पहली बार सीआरपीएफ तैनात है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जेएनयू के बारे में हड़ताली नेता जनता के सामने गलत छवि पेश कर लोगों को भ्रमित कर मूल मुद्दों से दूर ले जा रहे हैं। इनका विरोध फीस को लेकर कम हॉस्टल के बदले नियमों को लेकर अधिक है। जिससे भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधि पर लगाम लगेगा। जेएनयू में फ्री स्पीच, युवा लड़के-लड़कियों के जीने के तरीकों ने जेएनयू के पूरे कल्चर पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया गया। फ्रीडम के नाम पर जेएनयू में सबकुछ ठीक नहीं हो रहा है।

पिछले कई साल से जेएनयू से संबंधित कोई भी खबर इसकी साख को नुकसान पहुंचाने वाली ही है। विश्वविद्यालय परिसर से बाहर आने वाली खबरें चाहे वो समाचार का हिस्सा हो या सोशल मीडिया से आ रही जानकारी, शिक्षा के मंदिर की छवि को नुकसान ही पहुंचा रही है। जेएनयू कैंपस में शिक्षा सुचारू रूप से जारी रखने के लिए क्या हमें बेलगाम और देश विरोधी लोगों के आगे घुटने टेकना पड़ेगा। विश्व में भारतीय संस्कृति को स्थापित करने वाले स्वामी विवेकानंद की मूर्ति के साथ इस तरह का कृत्य ऐसे लोगों की कुत्सित मानसिकता सामने लाता है जो जेएनयू कैंपस के साथ देश का माहौल खराब करने की साजिश कर रहे हैं। ऐसे लोगों को पहचानना जरूरी है जो देश की भ्रामक तस्वीर पेश कर रहे हैं। ऐसे असामाजिक और राष्ट्रविरोधी तत्वों को विद्यार्थी कहना भी उचित न होगा। इनके विरुद्ध सख्त से सख्त कारवाई होनी चाहिए।

(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं।)

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