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Wednesday, July 28, 2021
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हाथी और शेर की मूर्ति की पूजा कर रहे ग्रामीण, इस आफत से छुटकारे की मांगी मन्न्त

रायपुर। हाथी-मानव द्वंद से लगातार हो रही मौतों के बाद अब इंसान आस्था का सहारा ले रहे हैं। गांव-गांव में युवाओं की टोली हाथी मित्र दल बनाकर जान-माल बचाने का जतन कर रही है। जिन गांवों के आस-पास हाथियों का दल विचरण करता है, वहां युवक काम-काज छोड़कर पूरे दिन जानमाल की रक्षा में लगे रहते हैं। छत्तीसगढ़ के हाथी प्रभावित जिलों में महासमुंद भी शामिल है।

जिले के गुड़रूडीह और कुकराडीह दो ऐसे गांव हैं, जहां के ग्रामीण हाथी से बचने के लिए आस्था का रास्ता अपना रहे हैं। कुकराडीह बंजर में तो ग्रामीणों ने पूरे दिन कामकाज बंद करके हाथी त्यौहार मनाया। यहां हाथी की मूर्ति स्थापित करके गांव के बधो-बड़े सभी ने पूजा अर्चना की।

करीब पचास हजार रुपये खर्च करके हाथी हाथी की मूर्ति स्थापित की और मन्नतें मांगी कि हे गजानन… जंगली हाथियों से हमारी रक्षा करना। इधर, गुड़रूडीह, फुसेराडीह, लहंगर, मोहकम, सेनकपाट गांव के ग्रामीण तिराहे पर बरदेव बाबा की स्थापना करके दो शेर की मूर्ति स्थापित की है।

उनकी आस्था है कि हाथी और शेर की मूर्ति पर आस्था और श्रद्घाभाव से पूजा-अर्चना करने से अलौकिक शक्तियां उनकी रक्षा करेंगी। हाथी से फसल और जानमाल की सुरक्षा कर पाना ग्रामीणों और वन विभाग के बस की बात नहीं है।

सभी प्रयास हो गए विफल, तब भगवान की शरण में हैं वनवासी किसान

महासमुंद जिले में 2016 से जंगली हाथियों का विचरण रहवासी क्षेत्र में बढ़ा है। मई-2016 में हाथियों ने सिरपुर के पास लकड़ी बीनने जंगल गई एक महिला को कुचलकर मार डाला था। इसी के साथ मानव-हाथी द्वंद की इस जिले में शुरूआत हुई।

द्वंद को रोकने के लिए किए ऐसे प्रयोग

जुलाई 2016 में वन विभाग ने वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ रूद्र से इस समस्या के समाधान के लिए बात की। उन्होंने मिर्ची और तंबाकू जलाकर हाथियों को भगाने का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया। ऐसा करने से हाथी आक्रामक होने लगे। इसके बाद अक्टूबर 2016 में कोलकाता से हुल्ला पार्टी को हाथियों को खदेड़ने का जिम्मा दिया गया।

मसाल जलाकर और भाले से वार करके हाथियों को जंगल की ओर भगाने का प्रयास किया गया। इससे हाथी और भी बौखला गए और मानव-हाथी द्वंद बढ़ गया। दिसंबर 2016 में जशपुर से हाथी प्रशिक्षण दल को गांवों में तैनात किया गया, जो माइक से ग्रामीणों को सतर्क रहने के लिए आगाह करते थे। यह प्रयास भी विफल रहा। इसके बाद एसओएस की टीम देहरादून से आई। ग्रामीणों को हाथी से दूरी बनाकर चलने के लिए प्रशिक्षित किया। हाथी के हमले से बचने के उपाय सुझाए गए। बावजूद मौतों का सिलसिला नहीं थमा।

जशपुर से लाए गए थे कुमकी हाथी

जनवरी 2018 में जशपुर से कुमकी हाथी लाकर रेडियोकालर से हाथी का लोकेशन ट्रेस करने का क्रम शुरू हुआ। इस अभियान में एक मादा हाथी को रेडियोकालर पहनाया गया है। जिससे हाथियों के विचरण की स्थिति देखकर ग्रामीणों को सतर्क किया जाता है। हाथियों के विचरण से इस क्षेत्र में फसल को लगातार नुकसान हो रहा है। खाकर और रौंदकर हाथी धान फसल को क्षति पहुंचा रहे हैं। इससे किसान हलाकान हो गए हैं। अब फसल और जान बचाने के लिए पूजा-पाठ कर रहे हैं। शेर- हाथी की मूर्ति बनाकर टोटके कर रहे हैं।

जंगल पर बढ़ रहा कब्जा, इसलिए उपजा द्वंद

आबादी बढ़ने के साथ ही वन क्षेत्र घट रहा है। वनवासी जंगल को काटकर अपना आशियाना बना रहे हैं। ऐसे में वन क्षेत्र निरंतर घट रहा है। इस स्थिति में भारी भरकम शरीर वाला वन्यजीव हाथी भोजन-पानी की तलाश में निरंतर रहवासी क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। इससे फसल को नुकसान हो रहा है।

जंगल और जंगलों के आसपास के इलाके इंसानों और जानवरों की रणभूमि में तब्दील हो रहा है। दोनों अपने-अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। दोनों का एक दूसरे पर से भरोसा उठ चुका है। एक दूसरे के जान के दुश्मन बन बैठे हैं। 2016 से अब तक महासमुंद जिले में 16-17 लोगों की मौत हाथी के हमले से हुई है। वहीं एक हाथी को ग्रामीणों ने जंगल से गुजरे विद्युत लाइन से तार हुकिंग करके करंट का जाल बिछाकर मार डाला था।

शुभांकुर पाण्डेय प्रधान कार्यालय
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